जयपुर | राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटों के लिए चुनावी बिसात बिछ चुकी है और इसके लिए नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। इसके बावजूद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने आधिकारिक प्रत्याशियों के नामों की घोषणा अभी तक नहीं की है। हालांकि, सियासी गलियारों में संभावित चेहरों को लेकर कयासबाजी का दौर चरम पर है और माना जा रहा है कि अगले दो से तीन दिनों के भीतर दोनों ही दल अपने पत्ते खोल सकते हैं। विधानसभा के वर्तमान संख्या बल की गणित को देखें तो तीन सीटों में से भाजपा के खाते में दो और कांग्रेस के पाले में एक सीट जाना पूरी तरह तय माना जा रहा है।
भाजपा में अलका गुर्जर का नाम लगभग तय, दूसरी सीट के लिए बिट्टू और पूनिया में मुकाबला
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, भाजपा इस बार अपने कोटे की दो सीटों में से एक सीट पर महिला कार्ड खेलने की तैयारी में है। इस रेस में भाजपा की राष्ट्रीय सचिव अलका गुर्जर का नाम सबसे आगे और लगभग फाइनल माना जा रहा है। वहीं, दूसरी सीट के लिए दो बड़े सियासी चेहरों के बीच कड़ा मुकाबला है। इसमें पहला नाम केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का है, जिनका वर्तमान कार्यकाल जून दो हजार छब्बीस में खत्म हो रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके समीकरणों को देखते हुए उन्हें दोबारा उच्च सदन भेजा जा सकता है। यदि ऐसा नहीं होता है, तो उन्हें गुजरात से मौका दिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में जाट राजनीति और संगठन पर मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया की लॉटरी लग सकती है। हालांकि, चर्चाओं में राजेंद्र राठौड़, कैलाश चौधरी और ज्योति मिर्धा के नाम भी शामिल हैं, लेकिन अंतिम मुकाबला इन्हीं तीन चेहरों के इर्द-गिर्द सिमटा है।
कांग्रेस में पवन खेड़ा का पलड़ा भारी, राष्ट्रीय चेहरे पर दांव लगाने की रणनीति
दूसरी ओर, अपने हिस्से की एकमात्र सुरक्षित सीट को लेकर कांग्रेस खेमे में भी मंथन का दौर जारी है। इस रेस में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा का नाम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभरा है। स्थानीय गुटबाजी और कलह से बचने के लिए कांग्रेस आलाकमान किसी बाहरी या दिल्ली के बड़े राष्ट्रीय चेहरे को राजस्थान से राज्यसभा भेजने की रणनीति पर विचार कर रहा है। पवन खेड़ा के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह, धीरज गुर्जर और निवर्तमान सांसद नीरज डांगी के नामों पर भी विचार-विमर्श किया जा रहा है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि उम्मीदवार ऐसा होना चाहिए जो आगामी सांगठनिक चुनौतियों में सबको साथ लेकर चल सके।
आधी आबादी को प्रतिनिधित्व देने की चुनौती और आगामी चुनावों का सामाजिक संतुलन
इस राज्यसभा चुनाव में महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी खासा सुर्खियों में है। लोकतांत्रिक इतिहास पर नजर डालें तो साल उन्नीस सौ बावन से लेकर अब तक राजस्थान से महज नौ महिलाएं ही उच्च सदन (राज्यसभा) तक पहुंच सकी हैं। वर्तमान में सूबे की दस राज्यसभा सीटों में से केवल सोनिया गांधी ही एकमात्र महिला सांसद हैं। ऐसे में यदि भाजपा अलका गुर्जर को उम्मीदवार बनाती है, तो यह आधी आबादी को साधने का एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा। विश्लेषकों का मानना है कि इस बार का राज्यसभा चुनाव सिर्फ सीटों के जोड़-तोड़ का गणित नहीं है, बल्कि यह साल दो हजार अठाईस के विधानसभा चुनाव और दो हजार उनतीस के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने का एक बड़ा जरिया बनेगा।









