“UNGA में भारत का पाकिस्तान को दोटूक: यह वैश्विक मंच है, झूठ की मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री नहीं”

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नई दिल्ली |  संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर करारा जवाब दिया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वथनेनी हरीश ने सुरक्षा परिषद की वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान दो टूक कहा कि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठाना पूरी तरह से निराधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस विषय पर किसी भी तीसरे देश को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह भारत का आंतरिक मामला है। इसके साथ ही, उन्होंने सुरक्षा परिषद के नवनिर्वाचित सदस्यों—पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, जिम्बाब्वे, किर्गिस्तान, और त्रिनिदाद व टोबैगो—को बधाई देते हुए याद दिलाया कि इस परिषद का मुख्य काम दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखना है।

विभाजनकारी राजनीति के लिए वैश्विक मंच का दुरुपयोग

भारतीय प्रतिनिधि ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की हरकतों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने हमेशा की तरह इस बार भी अपने संकीर्ण राजनीतिक फायदों के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित मंच का गलत इस्तेमाल किया है। सुरक्षा परिषद में अपनी अस्थाई सदस्यता का दुरुपयोग करते हुए पाकिस्तान ने केवल गुमराह करने वाली और झूठी बातें फैलाई हैं। पर्वथनेनी हरीश ने नसीहत देते हुए कहा कि परिषद का हिस्सा बनना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, और इसे व्यक्तिगत एजेंडा चलाने या भ्रामक प्रचार करने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर पर भारत का अटूट और स्पष्ट रुख

भारत ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान की बयानबाजी से जमीनी हकीकत को बदला नहीं जा सकता। हरीश ने जोर देकर कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अटूट और अभिन्न हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। इसके खिलाफ किया जाने वाला कोई भी दावा न केवल बेबुनियाद है, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों से भी परे है। पाकिस्तान चाहे जितने भी झूठे तर्क दे ले, वह सच्चाई को झुठला नहीं सकता।

सुरक्षा परिषद के ढांचे में सुधार की वकालत

भाषण के दौरान भारतीय प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद के कामकाज और उसकी प्रासंगिकता पर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि परिषद की सालाना रिपोर्ट केवल तथ्यों का संकलन होने के बजाय विश्लेषणात्मक होनी चाहिए, जिसमें कमियों और सुधार के क्षेत्रों को प्रमुखता से दिखाया जाए। उन्होंने मौजूदा वैश्विक चुनौतियों का हवाला देते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद का वर्तमान ढांचा साल 1945 की भू-राजनीतिक स्थिति पर आधारित है। अगर आज के समय के हिसाब से इसमें बदलाव नहीं किए गए, तो यह संस्था भविष्य की चुनौतियों से निपटने में बेअसर साबित होगी।