नई दिल्ली। देश के राजनीतिक समर के परिणाम आने के बाद विपक्षी खेमे में एक बार फिर से रणनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। सोमवार को देश की राजधानी में स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में विपक्षी महागठबंधन 'इंडिया ब्लॉक' (INDIA Block) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। चुनावी नतीजों की घोषणा के बाद सभी गठबंधन सहयोगी दलों का यह पहला बड़ा औपचारिक जमावड़ा था, जिसमें भविष्य की सियासी रूपरेखा और आगामी सांगठनिक कदमों पर बेहद गंभीर मंथन किया गया। इस महामंथन में देश के 23 प्रमुख राजनीतिक दलों के कुल 27 शीर्ष राजनेताओं ने हिस्सा लिया। हालांकि, इस महत्वपूर्ण मोड़ पर भी कुछ बेहद रसूखदार और बड़े क्षेत्रीय दलों की गैर-मौजूदगी ने राजनैतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है और विपक्षी एकता के दावों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
देशभर के दिग्गजों का हुआ महाजुटान और उद्धव ठाकरे वर्चुअली जुड़े
इस अहम कूटनीतिक बैठक में विपक्षी मोर्चे के लगभग सभी कद्दावर चेहरे एक मंच पर एकजुट नजर आए। राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की धुरी मानी जाने वाली कांग्रेस पार्टी की ओर से सोनिया गांधी, राहुल गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कमान संभाली। उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता हासिल करने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी इस चर्चा का मुख्य हिस्सा बने। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी अपने सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ विशेष रूप से दिल्ली पहुंचकर इस बैठक में शामिल हुईं। इसके अतिरिक्त बिहार से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के तेजस्वी यादव, जम्मू-कश्मीर से नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की तरफ से सरफराज अहमद ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। महाराष्ट्र की राजनीति से शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे अपरिहार्य कारणों से दिल्ली नहीं आ सके, परंतु उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअली जुड़कर अपनी प्रतिबद्धता जताई, जबकि एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की ओर से सांसद सुप्रिया सुले ने मोर्चे को संभाला। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल का इस बैठक में मौजूद रहना भी विपक्षी एकजुटता के लिहाज से एक बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
वामपंथी धड़े और छोटे क्षेत्रीय दलों ने दिखाई अपनी सांगठनिक ताकत
सदन के भीतर सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए वामपंथी दलों और देश के सुदूर हिस्सों से आए छोटे क्षेत्रीय दलों ने भी इस बैठक में अपनी पूरी सांगठनिक ताकत का अहसास कराया। वामपंथी मोर्चे से सीपीएम के जॉन ब्रिटास, सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव डी. राजा और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य ने अपनी नीतियों को सामने रखा। दक्षिण भारत और अन्य राज्यों से आरएसपी के एन.के. प्रेमचंद्रन, आईयूएमएल के सादिक थंगल, वीसीके के थिरुमावलवन और एमडीएमके के कद्दावर नेता डी. वाइको ने विमर्श में हिस्सा लिया। केरल कांग्रेस की तरफ से के. जॉर्ज और केरल कांग्रेस (एम) से जोस के. मणि ने अपने विचार साझा किए। इनके साथ ही राजस्थान और उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के हनुमान बेनीवाल, लोकदल के सुनील सिंह, फॉरवर्ड ब्लॉक के जी. देवराजन, शेतकारी कामगार पक्ष के जयंत पाटिल और भारत आदिवासी पार्टी (BAP) के प्रतिनिधियों ने भी इस राष्ट्रीय विमर्श में अपनी उपस्थिति से विपक्ष की आवाज को बुलंद किया।
डीएमके और आम आदमी पार्टी की अनुपस्थिति ने खड़े किए बड़े सवाल
गठबंधन को और अधिक मजबूत बनाने के सामूहिक दावों के बीच इस हाई-प्रोफाइल बैठक में कुछ खाली पड़ी कुर्सियां भी मीडिया की सुर्खियों का केंद्र बनी रहीं। दक्षिण भारत में विपक्ष का एक बड़ा गढ़ माने जाने वाले तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और दिल्ली व पंजाब की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस अत्यंत महत्वपूर्ण सांगठनिक बैठक से पूरी तरह दूरी बना ली। तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य से किसी भी प्रतिनिधि का न पहुंचना और राष्ट्रीय राजनीति में मुखर रहने वाली 'आप' का इस बैठक से पूरी तरह नदारद रहना, राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा को हवा दे रहा है कि नतीजों के बाद भी विपक्षी दलों के बीच आपसी सामंजस्य और हितों के टकराव को लेकर सब कुछ सामान्य नहीं है।









