जयपुर। राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर हाल के दिनों में प्रदेश की चरमराती स्वास्थ्य सेवाओं के गंभीर मुद्दों के साथ-साथ अपने तीखे बयानों को लेकर सियासी गलियारों और जनचर्चा में बने हुए हैं। कोटा और बीकानेर के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की असमय मृत्यु और किडनी फेल होने जैसी दर्दनाक घटनाओं के बीच स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दी गई कुछ दलीलें राज्य में बड़े राजनीतिक विवाद का कारण बन गई हैं।
विवादित बयान पर मंचा सियासी घमासान
बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में प्रसूताओं की मौत और कई मरीजों की किडनी खराब होने के संवेदनशील मामले पर मीडिया से बातचीत के दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने डाक्टरों का पक्ष लेते हुए एक बेहद चौंकाने वाली टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अस्पताल आने वाले मरीजों की सेहत पहले से ही काफी खराब थी। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि वे जानना चाहते हैं कि मरीज किस स्थिति में वहां पहुंचे थे, क्या वे पैदल नाचते हुए आए थे या फिर बीमार हालत में भर्ती हुए थे। जब पत्रकारों ने मंत्री के इस गैर-जिम्मेदाराना बयान पर कड़ा ऐतराज जताया, तो उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि जब अस्पताल हजारों लोगों का इलाज कर उनकी जान बचाते हैं, तब कोई उनकी तारीफ नहीं करता। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अगर एक हजार मरीजों में से दो की मौत हो जाती है, तो केवल मृत्यु दर की बात की जाती है, जबकि ठीक होकर घर लौटने वाले बाकी 998 मरीजों की सफलता को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जाता है।
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को लेकर किया बड़ा दावा
इससे पहले कोटा के एक अस्पताल में डिलीवरी के बाद महिलाओं की हालत बिगड़ने और किडनी फेल होने की घटनाओं पर भी खींवसर का एक बयान काफी सुर्खियों में रहा था। उन्होंने प्रसव के दौरान इस्तेमाल होने वाले ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की गुणवत्ता पर उंगली उठाते हुए दावा किया था कि स्थानीय स्तर पर खरीदे गए उन इंजेक्शन्स में जीवन रक्षक दवा की जगह सिर्फ पानी भरा हुआ था। उन्होंने प्रशासनिक नियमों का हवाला देते हुए बताया कि अस्पतालों को आपात स्थिति में 20 से 25 फीसदी तक दवाइयां स्थानीय वेंडर्स से खरीदने की छूट होती है, जिसका गलत फायदा उठाया गया। मंत्री के अनुसार, प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव को रोकने के लिए जब डॉक्टरों ने महिलाओं को वह इंजेक्शन लगाया, तो दवा की मात्रा शून्य होने और केवल पानी होने के कारण ब्लीडिंग नहीं रुकी और प्रसूताओं की हालत गंभीर हो गई। हालांकि, बाद में इस कथित नकली दवा की जांच रिपोर्ट और उसकी प्रामाणिकता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए।
जवाबदेही और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
राज्य में एक के बाद एक सामने आ रहे प्रसूताओं की मौत और स्वास्थ्य संबंधी खिलवाड़ के मामलों ने सरकार पर चौतरफा राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। एक तरफ जहां प्रदेश के बड़े अस्पतालों की बदइंतजामी को लेकर जनता में भारी आक्रोश है, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य मंत्री के इन बयानों ने राज्य सरकार की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा दी हैं। मुख्य विपक्षी दल ने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीर बताते हुए सरकार से मांग की है कि वह स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करने और दोषियों की जवाबदेही तय करने के बजाय असंवेदनशील टिप्पणियां करना बंद करे। विपक्ष ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दवा की गुणवत्ता से जुड़ी वास्तविक रिपोर्ट को तुरंत जनता के सामने सार्वजनिक करने का दबाव बनाया है।









