रायपुर: पंडरी स्थित रायपुर जिला अस्पताल में इलाज कराने आने वाले मरीजों को आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाएं देने के उद्देश्य से खोला गया ब्लड बैंक अपने मूल लक्ष्यों को पूरा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। करीब सात वर्ष पहले बड़े तामझाम के साथ स्थापित किए गए इस ब्लड बैंक में मौजूदा समय में खून का एक भी परमानेंट स्टॉक उपलब्ध नहीं है। अस्पताल में दाखिल मरीजों को जब भी रक्त की सख्त जरूरत पड़ती है, तो उनके तीमारदारों को शहर के दूसरे सरकारी या प्राइवेट ब्लड बैंकों की तरफ दौड़ना पड़ता है। ऐसे में करोड़ों की लागत से बने इस ब्लड बैंक की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
आपातकालीन स्थिति में भी दूसरे अस्पतालों पर निर्भरता
जिला अस्पताल के भीतर गंभीर हालत में भर्ती मरीजों को खून की जरूरत होने पर अस्पताल प्रशासन खुद हाथ खड़े कर देता है। पीड़ित परिवारों को रक्त के इंतजाम के लिए मेकाहारा (डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल), रेडक्रॉस ब्लड बैंक या निजी पैथोलॉजी केंद्रों के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ता है। जबकि इस यूनिट को शुरू करने का मुख्य मकसद यही था कि अस्पताल को खून की जरूरतों के लिए किसी बाहरी संस्थान पर निर्भर न रहना पड़े।
मशीनें धूल खा रहीं, सिर्फ होल ब्लड का ही विकल्प
अस्पताल प्रबंधन की तरफ से यह दलील दी जाती है कि यहां आवश्यकता पड़ने पर सिर्फ 'होल ब्लड' (पूरा खून) देने का प्रावधान है। हालांकि, आज की आधुनिक चिकित्सा पद्धति में ज्यादातर बीमारियों के इलाज में पूरे खून के बजाय कंपोनेंट ब्लड (जैसे- प्लेटलेट्स, प्लाज्मा या पैक्ड रेड सेल्स) की मांग की जाती है। मरीज की स्थिति के अनुसार इन घटकों की जरूरत होती है, लेकिन जिला अस्पताल में यह आधुनिक सुविधा आज तक धरातल पर नहीं उतर सकी है।
अस्पताल के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ब्लड बैंक में लंबे समय से खून का कोई न्यूनतम कोटा या स्टॉक मेंटेन ही नहीं किया जा रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि मांग कम होने से ब्लड एक्सपायर (खराब) होने का डर रहता है। इसके विपरीत, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ कहना है कि किसी भी आपातकालीन यूनिट का मतलब ही यह है कि वहां हर वक्त जरूरत के लिए पर्याप्त जीवन रक्षक रक्त मौजूद होना चाहिए।
लाइसेंस की फाइल अटकी, कंपोनेंट यूनिट बंद
हैरानी की बात यह है कि ब्लड कंपोनेंट को अलग करने वाली बेहद महंगी और आधुनिक मशीनें अस्पताल परिसर में लाकर स्थापित तो कर दी गई हैं, लेकिन संबंधित विभाग से जरूरी लाइसेंस न मिल पाने के कारण वे बेकार पड़ी धूल खा रही हैं। कानूनी मंजूरी के अभाव में मरीजों को प्लेटलेट्स और प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा है और गंभीर मरीजों को तुरंत दूसरे बड़े अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है।
सामुदायिक केंद्रों से भी बदतर हालत, सिविल सर्जन ने दी सफाई
एक तरफ जहां जिले के दूर-दराज के कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) में बनी ब्लड स्टोरेज इकाइयां रेडक्रॉस के समन्वय से बखूबी काम कर रही हैं, वहीं राजधानी के मुख्य जिला अस्पताल का यह हाल चिंताजनक है।
इस अव्यवस्था को लेकर जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. बी.के. सिन्हा ने सफाई देते हुए कहा कि ब्लड कंपोनेंट की सुविधा को विधिवत शुरू करने के लिए ड्रग कंट्रोलर और संबंधित विभागों से लाइसेंस लेने की कागजी प्रक्रिया जारी है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि अनुमति मिलने में कुछ वक्त जरूर लग सकता है, लेकिन मंजूरी आते ही मरीजों को इसका पूरा लाभ मिलने लगेगा। फिलहाल आपातकालीन स्थिति में दूसरे स्वीकृत संस्थानों से तालमेल बिठाकर खून की व्यवस्था कराई जा रही है।









