श्रीलंका को कच्चातीवू सौंपने के मुद्दे पर BJP का कांग्रेस पर तीखा हमला

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नई दिल्ली। वर्ष 1974 में कच्चातीवू द्वीप को श्रीलंका को सौंपे जाने के ऐतिहासिक निर्णय को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को भाजपा ने कांग्रेस की तीखी आलोचना करते हुए इस समझौते को उसके तत्कालीन शासनकाल का एक और काला अध्याय करार दिया। सत्तारूढ़ दल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने इस द्वीप पर से अपना हक छोड़कर देश के राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता के साथ बड़ा समझौता किया था। गौरतलब है कि भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य में स्थित कच्चातीवू एक निर्जन द्वीप है, जिस पर भारत सरकार ने 1974 में एक द्विपक्षीय समझौते के तहत श्रीलंका के अधिकार को मान्यता दे दी थी।

ऐतिहासिक समझौतों पर प्रहार और मछुआरों की बदहाली का मुद्दा

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने इस विषय पर देश का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि आपातकाल की बरसी के तुरंत बाद कांग्रेस के इतिहास की एक और बड़ी कूटनीतिक चूक सामने आती है। उन्होंने रेखांकित किया कि 26 जून 1974 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तमिलनाडु के तट के निकट स्थित रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कच्चातीवू द्वीप को श्रीलंका के हवाले कर दिया था, जिसके चलते आज तक तमिलनाडु के स्थानीय मछुआरों को समुद्र में निरंतर कई तरह की प्रताड़नाओं और गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। त्रिवेदी ने द्वीप पर स्थित ऐतिहासिक सेंट एंथनी चर्च का विशेष उल्लेख करते हुए दावा किया कि आज भारतीय नाविकों को अपनी नौकाओं पर तिरंगा झंडा लगाने के बावजूद उस क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं मिलती है, जो कांग्रेस की कमजोर विदेश नीति का नतीजा है।

देश की सीमाओं और भूभागों को गंवाने का लंबा इतिहास

भाजपा प्रवक्ता ने कांग्रेस की पुरानी नीतियों पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि देश की सीमाओं और राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने का विपक्ष का इतिहास बेहद पुराना रहा है। उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से आरोप लगाया कि इस कूटनीतिक आत्मसमर्पण की शुरुआत वर्ष 1947 में देश के विभाजन और मुस्लिम लीग के समक्ष घुटने टेकने के साथ हुई थी। इसके बाद वर्ष 1948 में कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा (पीओके) पाकिस्तान के नियंत्रण में चला गया और फिर 1962 के युद्ध के दौरान अक्साई चिन का इलाका चीन को सौंप दिया गया। उन्होंने देश की ऐतिहासिक धरोहरों का जिक्र करते हुए कहा कि मानसरोवर सहित असम का क्षेत्र भी लगभग खोने की कगार पर पहुंच गया था और इसी कड़ी के तहत 26 जून को कच्चातीवू का हस्तांतरण हुआ, जो 28 जून को पूरी तरह श्रीलंका के नियंत्रण में चला गया।

केरल की आबकारी नीति पर वार और बढ़ते नशे पर चिंता

कच्चातीवू विवाद के साथ-साथ भाजपा ने केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) गठबंधन के हालिया राजनीतिक फैसलों को भी आड़े हाथों लिया है। भाजपा ने राज्य में कम अल्कोहल वाली मदिरा पर उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) को 251% से भारी कटौती कर 121% करने के निर्णय पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पार्टी का आरोप है कि इस रियायत से राज्य के युवाओं में शराब पीने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और चुनिंदा शराब कारोबारियों को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए राज्य के राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। त्रिवेदी ने विपक्ष के ही वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला के पुराने बयानों का हवाला देते हुए कहा कि जब राज्य में नशीले पदार्थों की समस्या पहले से ही पंजाब जैसी गंभीर चुनौती बन चुकी है, ऐसे में शराब को बढ़ावा देना बेहद चिंताजनक है और इस मामले में यूडीएफ व एलडीएफ दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।