आरसीपी सिंह के बदले तेवर, नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद दिए बड़े संकेत

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पटना। बिहार के राजनीतिक गलियारों में शनिवार को उस समय अचानक हलचल बढ़ गई जब पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह ने सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की। एक लंबे अरसे से दोनों बड़े नेताओं के बीच बनी हुई कड़वाहट और दूरी के बाद अचानक हुई इस मुलाकात ने राज्य के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। इस बैठक के बाद से ही राजनीतिक हलकों में आरसीपी सिंह की जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में दोबारा एंट्री को लेकर चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म हो गया है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम और संभावित वापसी पर अभी तक जेडीयू या सरकार की तरफ से कोई भी आधिकारिक टिप्पणी या बयान जारी नहीं किया गया है।

चार साल पुराना गतिरोध टूटने के संकेत

आरसीपी सिंह को किसी समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सबसे विश्वस्त और करीबी रणनीतिकार माना जाता था। मगर साल 2022 में दोनों नेताओं के आपसी संबंधों में आए बड़े बिखराव के बाद उन्होंने जेडीयू से इस्तीफा दे दिया था। पार्टी से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी एक नई राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश की और इसी सिलसिले में वे 'जन सुराज' अभियान का हिस्सा भी बने, लेकिन वहां भी उनकी पारी बहुत लंबी नहीं चल सकी। अब इतने सालों बाद नीतीश कुमार के साथ उनके दोबारा बैठने से बिहार की राजनीति में उनके अगले कदम को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।

'हम तो जेडीयू में हैं' वाले बयान ने चौंकाया

मुलाकात खत्म होने के बाद जब आरसीपी सिंह मीडिया के सामने आए, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि "हम तो जेडीयू में हैई हैं, ऐसा मानकर चलिए न… थोड़ा इंतजार कीजिए और सब कुछ समय-काल पर छोड़ दीजिए।" राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका यह बयान साफ तौर पर पुरानी पार्टी में उनकी वापसी का एक मजबूत इशारा है, भले ही उन्होंने अभी तक औपचारिक रूप से जेडीयू की सदस्यता लेने का एलान नहीं किया हो।

कुर्मी वोट बैंक और सामाजिक समीकरणों पर असर

राजनीति के जानकारों की मानें तो बिहार के सामाजिक ताने-बाने में कुर्मी समाज हमेशा से जेडीयू का एक बेहद मजबूत और पारंपरिक वोट बैंक रहा है। ऐसे में आरसीपी सिंह जैसे अपनी जाति के प्रभावशाली और कद्दावर चेहरे की मुख्यधारा में वापसी से जेडीयू अपने पुराने सामाजिक समीकरण को और ज्यादा धार दे सकती है। इस रणनीतिक मुलाकात को आने वाले चुनावों के मद्देनजर पार्टी को अंदरूनी रूप से मजबूत करने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है।