डकैत क्यों बना जगन गुर्जर? पूर्व भाजपा नेता ने गिनाए चौंकाने वाले कारण

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अजमेर/धौलपुर। अजमेर की हाई सिक्योरिटी जेल में कुख्यात डकैत जगन गुर्जर की मौत के बाद एक बार फिर बीहड़ों और अपराध की दुनिया से जुड़ी चर्चाएं तेज हो गई हैं। जगन गुर्जर की मौत ने उसके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को सामने ला दिया है। इस बीच, धौलपुर के पूर्व जिला प्रमुख और पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष दुर्गा सिंह ने जगन के जीवन पर रोशनी डालते हुए अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि जगन गुर्जर जन्म से कोई अपराधी या डकैत नहीं था, बल्कि बदलते हालात, बुरी संगत और एक के बाद एक दर्ज होते मुकदमों ने उसे इस दलदल में धकेल दिया, जहाँ से चाहकर भी वह कभी वापस नहीं लौट पाया।

साधारण परिवार से बीहड़ तक का सफर

दुर्गा सिंह के मुताबिक, जगन गुर्जर मूल रूप से धौलपुर जिले के डांग क्षेत्र में स्थित भगवतीपुरा गांव का रहने वाला था। उसका परिवार बेहद साधारण और सीधा-साधा था। उसके पिता शिवचरण एक बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जो स्थानीय मंदिर में पूजा-पाठ कर अपना जीवन व्यतीत करते थे। परिवार का गुजारा मुख्य रूप से पशुपालन और दूध बेचने से होने वाली कमाई पर चलता था। शुरुआती दिनों में जगन का अपराध की दुनिया से कोई वास्ता नहीं था और वह एक आम ग्रामीण युवा की तरह ही जीवन जी रहा था।

रंजिश और भटकाव ने बनाया अपराधी

जगन के जरायम की दुनिया में कदम रखने की कहानी छोटे-मोटे विवादों से शुरू हुई थी। शुरुआती समय में जगन अपने साथी मोहन गुर्जर के साथ मिलकर छोटी-मोटी वारदातों को अंजाम दिया करता था। लेकिन धीरे-धीरे आपसी रंजिश, बदले की आग और गलत लोगों के संपर्क में आने के कारण वह अपराध की गहराइयों में उतरता चला गया। डांग क्षेत्र के पिछड़ेपन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस इलाके के कई युवा आज भी कानून की सही समझ न होने, तंगहाली और सही मार्गदर्शन के अभाव में भटक जाते हैं और जाने-अनजाने बंदूक थाम लेते हैं।

आत्मसमर्पण के बाद भी नहीं छूटा जुर्म का दामन

हैरानी की बात यह है कि जगन गुर्जर ने अपने जीवनकाल में कई बार पुलिस और कानून के सामने सरेंडर किया। जेल से बाहर आने के बाद उसने हर बार मुख्यधारा में लौटने और अपराध का रास्ता छोड़ने का वादा भी किया था। मगर अत्यधिक शराब की लत, पुराने साथियों का दबाव और अपराध से घिरा माहौल उसे बार-बार पीछे खींच लेता था। एक बार जब कोई व्यक्ति इस काली दुनिया में कदम रख देता है, तो समाज और व्यवस्था उसे आसानी से दोबारा स्वीकार नहीं करती, जिसके कारण वह चाहकर भी सुधर नहीं पाया।

विडंबना और छवि के पीछे का सच

पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष ने यह भी साफ किया कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में जगन गुर्जर का नाम भले ही एक बड़े खौफ के रूप में जाना जाता था, लेकिन कई मामलों में उसे जरूरत से ज्यादा प्रचार मिला। कई बार ऐसा हुआ कि अपराध किसी और ने किया लेकिन नाम जगन गुर्जर का उछाल दिया गया। कुछ खास राजनीतिक और सामाजिक हालातों में ऐसे लोगों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए भी किया जाता है, जिससे उनकी छवि असलियत से कहीं ज्यादा डरावनी और बड़ी दिखने लगती है।

युवाओं के लिए सबक और सही दिशा की दरकार

जगन गुर्जर के इस दर्दनाक अंत को एक सबक के रूप में देखते हुए दुर्गा सिंह ने कहा कि डांग क्षेत्र के युवाओं में हिम्मत और संघर्ष करने के जज्बे की कोई कमी नहीं है, बस उन्हें सही मंच नहीं मिल पाता। अगर जगन गुर्जर के साहस और ऊर्जा को सही दिशा मिली होती, तो वह एक खूंखार डकैत बनने के बजाय देश की सीमा पर तैनात सेना का एक जांबाज जवान बनकर भारत का नाम रोशन कर सकता था। उन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ें क्योंकि जुर्म का अंत हमेशा दुखद और बर्बादी से भरा होता है। इसके साथ ही उन्होंने सरकार से भी मांग की है कि इस पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा, रोजगार और युवाओं को सही राह दिखाने के पुख्ता इंतजाम किए जाएं ताकि भविष्य में कोई दूसरा जगन गुर्जर न बने।