नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के विरुद्ध दाखिल की गई अर्जी पर सुनवाई करते हुए द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को सख्त हिदायत दी है। शीर्ष अदालत ने डीएमके की उस याचिका को निरस्त कर दिया है, जिसमें मुख्यमंत्री विजय द्वारा करूर भगदड़ के प्रभावित परिवारों से मुलाकात करने के कार्यक्रम पर आपत्ति जताई गई थी। इसके साथ ही, अदालत ने डीएमके के उन दावों पर भी विचार करने से साफ मना कर दिया, जिनमें आरोप लगाया गया था कि प्रदेश सरकार के मंत्री इस प्रकरण के साक्ष्यों या गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।
कार्यपालिका के दौरों पर कोर्ट की दोटूक
मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने डीएमके के वरिष्ठ अधिवक्ता रंजित कुमार की दलीलों पर कड़े सवाल दागे। पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका कभी भी कार्यपालिका के प्रमुख यानी मुख्यमंत्री के दौरों और कार्यक्रमों की रूपरेखा तय या नियंत्रित नहीं कर सकती। इसके साथ ही माननीय न्यायाधीशों ने इस बात पर भी आश्चर्य प्रकट किया कि किसी दुखद हादसे का शिकार हुए लोगों और उनके परिजनों से सांत्वना स्वरूप मिलना, गवाहों को प्रभावित करने के दायरे में किस तरह आ सकता है।
याचिका वापसी के साथ पटाक्षेप
अदालत के कड़े तेवरों को देखते हुए पीठ ने याचिकाकर्ता के समक्ष विकल्प रखा कि वे या तो इस अर्जी को स्वयं वापस ले लें अथवा कानूनी रूप से उपलब्ध अन्य विकल्पों का रुख करें, अन्यथा न्यायालय इसे सीधे खारिज कर देगा। न्यायाधीशों के इस कड़े रुख के बाद अधिवक्ता रंजित कुमार याचिका को वापस लेने के लिए तैयार हो गए। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को वापस ली गई मानते हुए पूरी तरह से निस्तारित कर दिया।









