सोना खरीदने का सही समय? कीमतों पर लग सकता है ब्रेक, ये हैं 5 वजहें

0
8

नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में आई हालिया गिरावट के बाद मामूली सुधार जरूर दर्ज किया गया है, लेकिन साल 2026 की शुरुआत में बने रिकॉर्ड स्तर को दोबारा छू पाना फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है। फिच सॉल्यूशंस की रिसर्च विंग बीएमआई ने साल 2026 के लिए सोने के औसत मूल्य का अनुमान 4,600 डॉलर से घटाकर अब 4,400 डॉलर प्रति औंस कर दिया है। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना लगभग 4,026 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है, जिससे इसमें अधिकतम 9 फीसदी तक की तेजी की गुंजाइश दिखती है। मजबूत होता अमेरिकी डॉलर, कम होता वैश्विक तनाव और सुधरती अर्थव्यवस्था सोने की कीमतों पर दबाव बनाए रखने के मुख्य कारक साबित हो रहे हैं।

मजबूत डॉलर और ब्याज दरों में स्थिरता का दोहरा दबाव

वैश्विक बाजार में जब भी अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तो अन्य मुद्राओं वाले देशों के खरीदारों के लिए सोने का आयात महंगा हो जाता है, जिससे इसकी मांग सीधे तौर पर प्रभावित होती है। बीएमआई के अनुसार, डॉलर इंडेक्स के 98 से 102 के दायरे में रहने की उम्मीद है, लेकिन यदि यह 110 के स्तर तक चढ़ता है, तो सोने की कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है। इसके साथ ही, फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम दिखाई दे रही है और दरें 3.75 प्रतिशत पर स्थिर रह सकती हैं। चूंकि सोना कोई नियमित ब्याज या लाभांश नहीं देता, इसलिए ब्याज दरों के उच्च स्तर पर बने रहने से निवेशक बॉन्ड जैसे सुरक्षित और यील्ड देने वाले विकल्पों को अधिक प्राथमिकता देते हैं।

सुधरती वैश्विक अर्थव्यवस्था और घटता भू-राजनीतिक तनाव

वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार और अमेरिका व ईरान के बीच हुए समझौतों के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं काफी हद तक कम हुई हैं। अनुकूल आर्थिक परिस्थितियों के बीच निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने को छोड़कर शेयर बाजार और अन्य जोखिम वाले निवेश माध्यमों की ओर रुख कर रहे हैं। वर्ष 2026 में वैश्विक आर्थिक विकास दर 2.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसके अलावा, हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का आवागमन सामान्य होने और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के शांत पड़ने से सोने को मिलने वाला पारंपरिक 'सेफ हेवन' सपोर्ट भी धीरे-धीरे कमजोर होता नजर आ रहा है।

कमजोर होती महंगाई और घटती मांग का असर

महंगाई के खिलाफ एक बेहतरीन बचाव माध्यम माने जाने वाले सोने की मांग पर मुद्रास्फीति के नियंत्रण का भी नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऊर्जा की कीमतों में आई नरमी के कारण वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव काफी कम हुआ है, जिससे निवेशकों का सोने के प्रति आकर्षण घटा है। यदि भविष्य में भी महंगाई काबू में रहती है, तो सोने की कीमतों को सहारा देने वाला यह मजबूत कारक भी कमजोर पड़ जाएगा। हालांकि, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा की जा रही सोने की निरंतर खरीदारी इस गिरावट को रोकने में एक सुरक्षा कवच का काम करेगी, जिससे कीमतें पूरी तरह से क्रैश होने से बची रहेंगी।

भविष्य के संभावित उतार-चढ़ाव और कीमतों का अनुमान

आने वाले समय में यदि फेडरल रिजर्व अपनी मौद्रिक नीति में ढील देता है या अमेरिकी डॉलर में कोई बड़ी कमजोरी आती है, तो सोना एक बार फिर 4,500 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर सकता है। इसके विपरीत, यदि डॉलर की मजबूती बनी रहती है और बॉन्ड यील्ड में लगातार इजाफा होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दाम गिरकर 3,500 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक भी नीचे आ सकते हैं। फिलहाल सोने के बाजार में किसी भी बड़े अप्रत्याशित उछाल की संभावना कम ही दिखाई दे रही है और यह एक सीमित दायरे में ही घूमता रहेगा।