40 मीटर ऊंची चट्टानों से फूटा जलस्रोत, MP को मिलेगा नया जलभंडार

0
7

कटनी। मध्य प्रदेश के विकास और सिंचाई के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। कटनी जिले के स्लीमनाबाद में देश की सबसे लंबी, करीब 11.952 किलोमीटर लंबी जल-सुरंग (वाटर टनल) का निर्माण कार्य अब अपने बिल्कुल आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुका है। यह महत्वाकांक्षी टनल विंध्य और महाकौशल क्षेत्र के विकास के लिए एक बड़ी 'लाइफ चेंजर' साबित होने वाली है। भारत के इतिहास में तकनीकी रूप से इसे सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण अंडरग्राउंड प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। तमाम प्राकृतिक बाधाओं के बावजूद आखिरकार हमारे इंजीनियर्स ने इस लगभग नामुमकिन काम को मुमकिन कर दिखाया है।

करीब 17 साल के लंबे इंतजार और कड़ी मशक्कत के बाद, विंध्य पर्वतमाला की 40 मीटर ऊंची और बेहद सख्त चट्टानों का सीना चीरकर यह सुरंग अब बनकर तैयार है। इससे विंध्य और महाकौशल क्षेत्र के 1,450 गांवों की प्यास बुझ सकेगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आज शुक्रवार को खुद इस बेहद खास टनल परियोजना का बारीकी से जायजा लिया। सरकार की ओर से दावा किया गया है कि इस सुरंग के चालू होने से पूरे क्षेत्र की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक क्रांतिकारी व ऐतिहासिक बदलाव आएगा।

सीएम मोहन यादव ने किया टनल का निरीक्षण

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कटनी में इस पूरी परियोजना की प्रगति का विस्तृत जायजा लिया। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए बताया कि लगभग 11.952 किलोमीटर लंबी यह सुरंग अब केवल आखिरी के मात्र एक मीटर के 'ब्रेक-थ्रू' (आर-पार खुदाई) से पूरी तरह कनेक्ट होने वाली है। काम पूरा होते ही यह देश की सबसे लंबी और तकनीकी रूप से सबसे जटिल जल-सुरंगों के रूप में इतिहास दर्ज करेगी। इस टनल के जरिए विंध्य पर्वतमाला के भीतर से नर्मदा नदी का पानी बिना किसी पंप के, केवल प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) के सहारे सोन नदी के बेसिन तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद बरगी दायीं तट मुख्य नहर के माध्यम से जबलपुर, कटनी, मैहर, सतना, रीवा और पन्ना जिलों के करीब 1,450 गांवों की लगभग 2.45 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को हमेशा के लिए पक्की सिंचाई की सुविधा मिल सकेगी।

विदेशी मशीनें भी हो गई थीं पूरी तरह फेल

स्लीमनाबाद में जमीन से करीब 80 से 100 फुट नीचे तैयार हो रही इस देश की सबसे लंबी टनल का सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 2008 में शुरू हुई इस परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती विंध्य पर्वतमाला की 40 मीटर ऊंची बेहद कठोर चट्टानें थीं। जमीन से लगभग 30 मीटर नीचे काम करने के लिए अमेरिका से विशेष टनल बोरिंग मशीनें मंगवाई गई थीं, लेकिन चट्टानों की मजबूती के आगे उन विदेशी मशीनों ने भी घुटने टेक दिए। काम के दौरान टनल के अंदर अचानक हर मिनट 25,000 लीटर तक पानी का भारी रिसाव (लीकेज) होने लगा। इस भारी पानी के दबाव को अमेरिकी मशीनें झेल नहीं पाईं और टूट-फूटकर बिखर गईं।

हादसे, परिवारों का विस्थापन और कई रुकावटें

अमेरिकी मशीनों के फेल हो जाने के बाद इस प्रोजेक्ट के पूरा होने पर बड़ा संकट खड़ा हो गया था, क्योंकि इस सुरंग की खुदाई करना सीधे मौत के कुएं में उतरने जैसा था। जमीन के अंदर मार्बल, डोलोमाइट और लाइमस्टोन की इतनी मजबूत चट्टानें थीं कि खुदाई का काम बेहद खतरनाक हो गया था। खुदाई के दौरान कई बार मिट्टी धंसने से काम को बीच में ही रोकना पड़ा। सुरक्षा के लिहाज से इस प्रोजेक्ट के लिए करीब 80 परिवारों को अपनी जमीन और घरों से विस्थापित होना पड़ा। दुखद पहलू यह भी रहा कि इस बेहद खतरनाक काम को अंजाम देते वक्त कई मजदूरों ने अपनी जान भी गंवा दी। इसके अलावा प्रशासनिक लेटलतीफी, तकनीकी खामियों और समय-समय पर बजट की कमी के चलते यह पूरी योजना लंबे समय तक अधर में लटकी रही।

17 साल बाद मुख्यमंत्री की पहल से काम पूरा

पिछले 17 वर्षों से अटकी पड़ी इस बेहद जरूरी परियोजना को तब रफ्तार मिली जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने खुद इसमें व्यक्तिगत रूप से रुचि ली और अड़चनों को दूर किया। उनके हस्तक्षेप के बाद प्रोजेक्ट पर दोबारा तेजी से काम शुरू हुआ और आज स्थिति यह है कि सुरंग का सिर्फ आखिरी 1 मीटर का रास्ता साफ होना बाकी रह गया है। इस सुरंग के पूरी तरह खुलते ही 6 जिलों की प्यासी धरती पानी से तरबतर हो जाएगी, जिससे लाखों किसानों को सीधे सिंचाई का पानी मिलेगा और पूरे क्षेत्र में एक नए आर्थिक समृद्धि युग की शुरुआत होगी।

अगर इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट के खर्च की बात करें, तो साल 2008 में जब यह योजना शुरू हुई थी तब इसकी प्रारंभिक अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर 1,610.47 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस परियोजना का करीब 96.66 प्रतिशत काम सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। इसमें 12.135 किलोमीटर की ओपन कट नहर और 11.952 किलोमीटर की मुख्य सुरंग का निर्माण शत-प्रतिशत पूरा हो गया है। अब 'कट एंड कवर' तकनीक से बनाई जा रही 0.913 किलोमीटर की नहर का केवल 0.188 किलोमीटर का छोटा सा हिस्सा बनना बाकी रह गया है, जो बहुत जल्द पूरा कर लिया जाएगा।