लाठीचार्ज में घायल किसान का बेटा बोला- जख्म मिले हैं, हौसला नहीं टूटा

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मऊगंज: दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा लीक और शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को लेकर जारी प्रदर्शन के बीच मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले का एक साधारण किसान परिवार पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। नईगढ़ी विकासखंड के अंतर्गत आने वाले मझिगवां गांव के निवासी अनिल सिंह देश के छात्रों के हक की इस लड़ाई में शामिल होने के लिए विशेष तौर पर दिल्ली गए थे। आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई में उनके घायल होने की सूचना जैसे ही उनके पैतृक गांव पहुंची, वैसे ही पूरे परिवार में गहरी चिंता और बेचैनी छा गई। हालांकि, एक तरफ जहां पत्नी की आंखें नम थीं और बच्चों की निगाहें लगातार रास्ते पर टिकी थीं, वहीं दूसरी तरफ एक किसान पिता के चेहरे पर अपने बेटे के इस अदम्य साहस के प्रति गर्व का भाव भी साफ नजर आ रहा था।

लाठी के जख्म और पिता का चट्टानीौसला

अनिल सिंह के पिता भोला सिंह ने अपने बेटे के घायल होने की खबर पर पीड़ा तो व्यक्त की, लेकिन उनके मुंह से निकले शब्द हर सुनने वाले को भावुक कर गए। उन्होंने गर्व से कहा कि उनका बेटा हमेशा से समाज के गरीबों और जरूरतमंदों के लिए ढाल बनकर खड़ा रहा है। पुलिस द्वारा उस पर लाठीचार्ज किए जाने का उन्हें दुख अवश्य है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा इस बात का फक्र है कि उनका बेटा देश और समाज के लिए संघर्ष कर रहा है। यदि राष्ट्र और विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की खातिर उनका बेटा कुर्बान भी हो जाता है, तो उन्हें दुख के साथ-साथ इस पर गर्व महसूस होगा। एक किसान पिता का यह बयान यह साबित करने के लिए काफी है कि बड़े संघर्ष केवल सड़कों पर नहीं लड़े जाते, बल्कि उन घरों के भीतर भी रचे जाते हैं जहां परिजन अपने प्रियजनों की सलामती की दुआ करते हैं।

मझिगवां के इस घर में टकटकी लगाए बैठा परिवार

जब संवाददाताओं की टीम मऊगंज जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर मझिगवां गांव स्थित उनके आवास पर पहुंची, तो वहां घर का हर एक कोना अनिल की वापसी की राह ताकता हुआ मिला। बुजुर्ग पिता भोला सिंह बार-बार अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए हुए थे। उनकी पत्नी ज्योति सिंह फोन की हर एक घंटी बजने पर चौंक जाती थीं। घर के छह साल के मासूम बेटे श्रेयांश और चार साल की बेटी अंशिका लगातार यह मासूमियत भरा सवाल पूछ रहे थे कि उनके पापा कब घर लौटेंगे। परिजनों ने जानकारी दी कि अनिल बीती 17 जुलाई की शाम लगभग चार बजे दिल्ली के लिए रवाना हुए थे। घर से निकलते वक्त उन्होंने अपनी पत्नी से स्पष्ट कहा था कि वे देश के छात्रों के अधिकारों और आने वाली नस्लों के बेहतर भविष्य के वास्ते इस लड़ाई का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

साधारण किसानी से जुड़ा युवक बना देश के छात्रों की आवाज

अनिल सिंह किसी भी बड़े राजनीतिक दल या संगठन से ताल्लुक नहीं रखते हैं। वे एक सामान्य किसान परिवार के होनहार बेटे हैं। अपनी शुरुआती दसवीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने खेती-बाबारी के कामों में अपने पिता का हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। गांव के लोगों का साझा तौर पर यह कहना है कि अनिल के भीतर बचपन से ही समाज सेवा का गहरा जज्बा कूट-कूट कर भरा था। गांव में यदि किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सहायता की आवश्यकता होती, तो अनिल मदद के लिए सबसे आगे खड़े नजर आते थे। उनकी पत्नी ज्योति सिंह एक गृहणी हैं, जबकि उनका बेटा श्रेयांश पहली कक्षा में और बेटी अंशिका एलकेजी में शिक्षा ग्रहण कर रही है। पूरा परिवार कृषि कार्य के सहारे ही अपना जीवनयापन करता है, इसके बावजूद अनिल हमेशा सामाजिक मुद्दों और सरोकारों से गहराई से जुड़े रहे।

पत्नी से कही थी वह बड़ी बात

अपनी दिल्ली यात्रा से पहले ज्योति सिंह से बातचीत करते हुए अनिल ने कहा था कि यदि आज देश के विद्यार्थियों के भविष्य के हक में आवाज बुलंद नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियों को इस बदहाल व्यवस्था की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने कहा था कि वे अपने खुद के बच्चों समेत देश के प्रत्येक छात्र के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए यह जंग लड़ने जा रहे हैं और जब तक पीड़ित छात्रों को न्याय नहीं मिल जाता, वे इस आंदोलन से पीछे हटने वाले नहीं हैं। दिल्ली से फोन पर बातचीत के दौरान भी उन्होंने अपने परिवार को ढांढस बंधाया कि वे पूरी दृढ़ता के साथ डटे हुए हैं और न्याय मिलने तक उनका यह संघर्ष यूं ही जारी रहेगा।

मासूम बेटी की बातें सुनकर नम हो जाती हैं आंखें

चार साल की छोटी सी अंशिका अभी आंदोलन और उसकी गंभीरता जैसे बड़े शब्दों से पूरी तरह अनजान है। वह सिर्फ इतना जानती है कि उसके पापा दिल्ली गए हैं और वहां पुलिस ने उन्हें चोट पहुंचाई है। वह अपनी बालसुलभ मासूमियत से कहती है कि उसके पापा ने वादा किया है कि वे जल्द लौटेंगे, लेकिन पुलिस वालों ने उन्हें मारा है। बच्ची की यह छोटी सी बात पूरे परिवार के भीतर छिपे दर्द को बयां कर देती है, जिसे सुनकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो जाती हैं।

पूरे गांव को अपने इस सपूत पर है नाज

मझिगवां गांव के तमाम ग्रामीणों का एक स्वर में कहना है कि अनिल सिंह ने देश के छात्रों के हक के लिए आवाज उठाकर पूरे गांव का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है। गांववालों का यह मानना है कि अपने निजी स्वार्थों और सुखों को ताक पर रखकर समाज के हित के लिए संघर्ष के मैदान में उतरना हर किसी के वश की बात नहीं होती। पूरा गांव ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा है कि उनका बेटा जल्द से जल्द पूरी तरह स्वस्थ होकर सुरक्षित अपने घर वापस लौट आए।

एक अकेले बेटे का नहीं, बल्कि संपूर्ण उम्मीदों का इंतजार

आज मझिगवां गांव का यह किसान परिवार महज अपने बेटे की घर वापसी का ही इंतजार नहीं कर रहा, बल्कि उस बड़ी उम्मीद की भी टकटकी लगाए बैठा है कि देश के हुक्मरान और व्यवस्था इन युवाओं की पुकार को जरूर सुनेगी। पिता के सीने का गर्व, पत्नी की दुआएं और मासूम बच्चों की सरल उम्मीदें इस पूरे प्रसंग को केवल एक सामान्य विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने देतीं, बल्कि इसे एक परिवार की भावनाओं और अटूट देशप्रेम से जोड़ देती हैं।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर गूंजती इन आवाजों के बीच मऊगंज के इस माटी के लाल की यह गाथा हमें यह अहसास कराती है कि हर बड़े आंदोलन की पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे घर भी होते हैं, जहां पड़ने वाली लाठी की हर एक चोट सीधे तौर पर पूरे परिवार के दिल पर लगती है। इसके बावजूद, जब एक पिता सीना चौड़ा करके यह कहता है कि देश और छात्रों के लिए यदि बेटा कुर्बान भी हो जाए तो उन्हें फक्र होगा, तो यह केवल एक पिता के साधारण बोल नहीं रह जाते, बल्कि यह त्याग, अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण की एक ऐसी जीवंत तस्वीर बन जाते हैं, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।