राहुल के प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की अपील

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नई दिल्ली। देश भर के अधिवक्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत को एक पत्र भेजकर सुप्रीम कोर्ट से 21 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास '7, लोक कल्याण मार्ग' के समक्ष हुए विरोध-प्रदर्शन का स्वतः संज्ञान (Sua Sponte) लेने की गुहार लगाई है। यह प्रदर्शन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य प्रमुख विपक्षी नेताओं द्वारा किया गया था।

हाईकोर्ट के वकीलों का हस्ताक्षर अभियान, राष्ट्रीय सुरक्षा पर जताई चिंता

विभिन्न उच्च न्यायालयों के वकीलों द्वारा हस्ताक्षरित और अधिवक्ता संकेत गुप्ता द्वारा समन्वित इस पत्र में शीर्ष अदालत से पूरी घटना की निष्पक्ष तथ्य-जाँच कराने की माँग की गई है। इसके साथ ही, वकीलों ने माँग की है कि अति-संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्रों में इस प्रकार के बिना अनुमति प्रदर्शनों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट बाध्यकारी दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी करे। वकीलों का तर्क है कि प्रधानमंत्री आवास के ठीक बाहर बिना पूर्व सूचना या अनुमति के जुटी यह भीड़ कोई सामान्य जनसभा नहीं थी, बल्कि यह सीधा राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा गंभीर मामला है।

केंद्रीय मंत्री के आश्वासन और पुलिस के अनुरोध के बाद भी जारी रहा धरना

पत्र में उल्लेख किया गया है कि राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी वाड्रा, अखिलेश यादव तथा केरल एवं कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों समेत कई सांसदों ने इस उच्च सुरक्षा वाले इलाके में अचानक धरना दिया था। आरोप है कि दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के बार-बार हटने के अनुरोध को दरकिनार कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने व्यक्तिगत रूप से राहुल गांधी से मुलाकात कर संसद में इस मुद्दे पर चर्चा का आश्वासन दिया और धरना समाप्त करने की अपील की, फिर भी कई घंटों तक प्रदर्शन जारी रहा। वकीलों ने राहुल गांधी के सोशल मीडिया पोस्ट पर भी सवाल उठाए, जिसमें उन्होंने आम जनता से वहां जुटने का आह्वान किया था।

विरोध का अधिकार असीमित नहीं, कानून के सामने सब समान

पत्र में वकीलों ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि लगभग तीन घंटे चले इस ड्रामे के बाद पुलिस को नेता प्रतिपक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को शारीरिक रूप से हटाना पड़ा। अधिवक्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) का हवाला देते हुए कहा कि यद्यपि नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मौलिक अधिकार है, लेकिन अनुच्छेद 19(3) के तहत यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में उचित प्रतिबंधों के अधीन आता है। पत्र में अंत में कहा गया है कि संविधान के समक्ष आम नागरिक और देश के शीर्ष पदों पर बैठे जनप्रतिनिधि समान हैं, अतः ऐसे संवेदनशील इलाकों में अराजक परंपरा की शुरुआत को रोकने के लिए सख्त कदम आवश्यक हैं।