मंदिर बन चुका था… फिर भी कहा गया- ‘काम रुकना नहीं चाहिए’, कानपुर के जेके कृष्ण धाम की रोचक कहानी

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जरा सोचिए, एक मंदिर बनकर तैयार हो चुका है, भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हो गए हैं, पूजा-पाठ भी शुरू हो गया है और देश-दुनिया से श्रद्धालु दर्शन के लिए आने लगे हैं, लेकिन इसके बाद भी कहा जाता है कि मंदिर में काम रुकना नहीं चाहिए. चाहे बड़ा निर्माण हो या सिर्फ एक ईंट ही क्यों न लगानी पड़े, कुछ न कुछ काम होते रहना चाहिए. इसके पीछे वजह भी ऐसी बताई जाती है कि सुनकर कहानी और दिलचस्प हो जाती है.

कानपुर के जेके मंदिर को लेकर प्रचलित किस्सा है कि मंदिर में लगातार काम चलता रहे तो परिवार का कारोबार और शोहरत भी लगातार बढ़ता रहता है. भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित यह भव्य मंदिर आज कानपुर की पहचान बन चुका है. शहर के सबसे प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल जेके मंदिर कानपुर के बड़े पर्यटन आकर्षणों में भी गिना जाता है. सफेद संगमरमर से चमकता विशाल मंदिर, ऊंचे शिखर और खूबसूरत परिसर आम दिनों में भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को खींचता है, जबकि जन्माष्टमी पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है. लाखों श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव में शामिल होने और मंदिर की भव्य सजावट देखने पहुंचते हैं.
1960 में पूरा हो गया था मंदिर का मुख्य निर्माण
कहानी यहीं खत्म नहीं होती, लोगों के बीच यह बात भी प्रचलित है कि अगर किसी दिन बड़ा निर्माण न हो सके, तो कम से कम एक ईंट ही लगा दी जाए, लेकिन मंदिर में काम का सिलसिला टूटना नहीं चाहिए. यही वजह है कि 1960 में मंदिर का मुख्य निर्माण पूरा हो जाने के छह दशक से ज्यादा समय बाद भी यहां जब कोई नया काम, मरम्मत या निर्माण दिखाई देता है तो लोग उसी पुराने किस्से को याद करने लगते हैं. हालांकि यह बात मंदिर की कोई आधिकारिक मान्यता नहीं है.

मां की इच्छा से शुरू हुई थी कृष्ण धाम बनाने की कहानी
मंदिर प्रबंधक सुधीर सिंह बताते हैं कि जेके मंदिर का परिसर काफी बड़ा है और इतने बड़े परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा, रखरखाव और सौंदर्यीकरण के लिए समय-समय पर काम होना स्वाभाविक है. लेकिन बाहर लोगों के बीच ‘एक ईंट’ वाली यह कहानी वर्षों से सुनाई जाती रही है और आज भी मंदिर की चर्चा के साथ इसका जिक्र जरूर होता है. इस दिलचस्प किस्से से अलग जेके मंदिर का इतिहास भी बेहद खास है. भगवान श्रीराधाकृष्ण को समर्पित इस मंदिर की नींव 1 जुलाई 1941 को रखी गई थी. जेके परिवार की राम प्यारी देवी भगवान श्रीकृष्ण की बड़ी भक्त थीं.

1960 में खुले मंदिर के कपाट
वृंदावन के मंदिरों में दर्शन के दौरान उनके मन में कानपुर में भगवान श्रीकृष्ण और राधा का भव्य मंदिर बनवाने की इच्छा हुई. उन्होंने अपने बेटे सर पदमपत सिंघानिया के सामने यह इच्छा रखी और यहीं से इस भव्य मंदिर की कहानी शुरू हुई. मंदिर को तैयार होने में करीब दो दशक लगे. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान निर्माण सामग्री की कमी से काम प्रभावित हुआ, लेकिन निर्माण जारी रहा. राजस्थान के मकराना से संगमरमर मंगाया गया और भारतीय मंदिर वास्तुकला की शैली में भव्य मंदिर तैयार किया गया. आखिरकार 1960 में मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया.
‘काम रुकना नहीं चाहिए’ वाली कहानी
निर्माण खत्म हुआ, लेकिन ‘काम चलते रहने’ की कहानी चलती रही. मंदिर के निर्माण के दौरान सर पदमपत सिंघानिया खुद काम की निगरानी करते थे. बताया जाता है कि वह रोज दोपहर करीब तीन बजे मंदिर पहुंचते और निर्माण की प्रगति देखते थे. पत्थर की गुणवत्ता और निर्माण की बारीकियों तक पर उनकी नजर रहती थी. आज मंदिर का मूल निर्माण पूरा हुए छह दशक से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन इतने बड़े परिसर में समय-समय पर निर्माण, मरम्मत और विकास का काम होता रहता है. कहीं श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यवस्था बदली जाती है तो कहीं परिसर की सुंदरता और सुविधाओं को बेहतर किया जाता है. इसी वजह से ‘काम रुकना नहीं चाहिए’ वाली कहानी को लोग आज भी जेके मंदिर से जोड़कर देखते हैं.
जन्माष्टमी पर सात दिन कृष्ण की लीलाओं से सजेगा मंदिर
जन्माष्टमी के मौके पर जेके मंदिर का माहौल और भी खास हो जाता है. इस बार सात दिवसीय श्रीकृष्ण लीला जन्माष्टमी महोत्सव आयोजित किया जा रहा है. भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनकी बाल लीलाओं और जीवन के प्रमुख प्रसंगों का मंचन किया जाएगा. श्रीकृष्ण जन्म, बाल लीलाएं, पूतना वध, कालिया दमन, महारास, गोवर्धन पर्वत उठाना, कंस वध, श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह और श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन जैसे प्रसंग महोत्सव का आकर्षण होंगे. जन्माष्टमी पर मंदिर विशेष रोशनी और सजावट से जगमगाएगा. लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए मंदिर परिसर में भी विशेष तैयारियां की जा रही हैं.
जेके मंदिर की कहानी लोगों को करती है आकर्षित
जेके मंदिर की कहानी में इसलिए एक साथ कई रंग दिखाई देते हैं- एक मां का सपना, भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आस्था, 1941 से शुरू हुआ निर्माण, 1960 में पूरा हुआ भव्य मंदिर और फिर उससे जुड़ी ‘एक ईंट’ की वह रोचक कहानी, जो आज भी कानपुर में लोगों को आकर्षित करती है. कहानी सच है, मान्यता है या महज लोगों के बीच चली आ रही एक दिलचस्प बात, यह अलग सवाल है. मगर जेके मंदिर की यही कहानी इसे कानपुर के सबसे खास धार्मिक और पर्यटन स्थलों में अलग पहचान देती है.