नीम करोली बाबा सिद्ध पुरुष थे. कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाते थे. उत्तराखंड की शांत वादियों में स्थित कैची धाम केवल उनका एक आश्रम नहीं, बल्कि एक ऐसा अलौकिक स्थान है जहां सत्ता, पद और धन का अहंकार क्षण भर में धराशायी हो जाता है. 20 वीं सदी के महान संत और श्री हनुमान जी के अवतार माने जाने वाले नीम करोली बाबा के दरबार में राजा हो या रंक सभी एक समान थे. कहा जाता है कि चाहे मंत्री हो या गर्वनर उनके आश्रम में आने वालो में सबको एक ही तरह से इंतजार करना पड़ता था. नीम करोली बाबा की सादगी में इतनी सिद्धि थी कि बड़े-बड़े केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यों के गवर्नर भी बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते थे. लेकिन सबको यहां आम भक्तों की तरह घंटों इंतजार करना पड़ता था. बाबा का स्पष्ट नियम था कि भक्ति और ईश्वर के दरबार में कोई VVIP कल्चर नहीं चलता. आइए पढ़ते हैं कैची धाम से जुड़ी वह दिलचस्प और हैरान कर देने वाली कथा, जब एक राज्यपाल को बाबा नीम करोली ने सादगी और अहंकार मुक्ति का ऐसा पाठ पढ़ाया, जिसे सुनकर आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे.
20 मिनट तक होल्ड पर रहे राज्यपाल
यह कथा एक राज्यपाल की है. नीम करोली बाबा पर संकलित केशव दास की किताब बेयरफूट इन हार्ट में इसका जिक्र है. इस किताब बाबा से संबंधित सत्य घटनाओं पर आधारित कई कहानियां लिखी गई है. इस किताब के मुताबिक एक बार नीम करोली बाबा एक होटल के कमरे में ठहरे हुए थे. उसी समय मध्य प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल का बाबा से बात करने के लिए फोन आया. जब कमरे में मौजूद एक भक्त ने बाबा को बताया कि मध्य प्रदेश के राज्यपाल आपसे बात करना चाहते हैं, तो बाबा ने बिना किसी जल्दबाजी या विशेष प्रतिक्रिया के सहजता से उठकर बाथरूम का रुख किया और अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया.इसके बाद जब फोन बजा और भक्त ने फोन उठाकर राज्यपाल महोदय को बताया कि महाराज-जी अभी बाथरूम गए हैं, तो राज्यपाल ने फोन काटने के बजाय लाइन होल्ड कर ली. मध्य प्रदेश के राज्यपाल पूरे 20 मिनट तक फोन पर होल्ड पर रहे जबकि बाबा को बाहर आने की कोई हड़बड़ी नहीं थी.
बाबा के एक अन्य अनन्य भक्त दादा मुखर्जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘द रेडिकली सिंपल मास्टरी ऑफ नीम करोली बाबा’ में भी 1970 के दशक के उत्तरार्ध में मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के कैंची धाम आने का जिक्र है. यह दोनों अलग-अलग घटना है. मध्यप्रदेश वाली कहानी संभवतः 1960-70 के दशक का प्रतीत होता है. जिस राज्यपाल को फोन पर 20 मिनट तक होल्ड रहना पड़ा, वे संभवतः सत्य नारायण सिन्हा रहे होंगे. हालांकि किताब में उनके नाम का जिक्र नहीं है. लेकिन जिस समय की यह घटना है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः सत्य नारायण सिन्हा ही वे राज्यपाल रहे होंगे. भक्तों के अनुसार यह कोई चमत्कार या अहंकार का प्रदर्शन नहीं था. बाबा के लिए कोई भी पद, प्रतिष्ठा या रुतबा मायने नहीं रखता था. उनके लिए राज्य का गवर्नर हो या कोई आम आदमी, सब बराबर थे. इसमें साफ संदेश छिपा हुआ था. चाहे व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो, जब वह व्यक्ति ईश्वर या किसी सिद्ध संत के दरवार में आता है तो उन्हें अपना अहंकार और पद-प्रतिष्ठा को छोड़ देना चाहिए. इसलिए बाबा के लिए कोई भी पद, प्रतिष्ठा या रुतबा मायने नहीं रखता था. उनके लिए राज्य का गवर्नर हो या कोई आम आदमी, सब बराबर थे.
दर्शन के लिए भी इंतजार
दादा मुखर्जी द्वारा लिखित पुस्तक द रेडिकली सिंपल मास्टरी ऑफ नीम करोली बाबा में कुछ इसी तरह के वाकये का जिक्र है. इसके मुताबिक एक बार एक तत्कालीन राज्यपाल बाबा नीम करोली जी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने कैंची धाम पहुंचे. उनके साथ भारी-भरकम सुरक्षाबल, अधिकारियों की गाड़ियों का काफिला और वीआईपी प्रोटोकॉल था. उस समय बाबा अपने आश्रम में एक साधारण से कंबल में बैठे भक्तों से बातचीत कर रहे थे. जब उन्हें राज्यपाल के आने की सूचना दी गई तो नीम करोली बाबा अपनी ही मौज में उस अधिकारी की बातों को सुनकर अनदेखा कर दिए और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. अधिकारियों ने जब दोबारा याद दिलाया, तो बाबा जी ने सहज भाव से कहा, उन्हें बैठने को कहो, अभी समय लगेगा. राज्यपाल महोदय को बाहर देर तक इंतजार करना पड़ा. सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों में इस बात को लेकर थोड़ी हलचल थी कि इतने बड़े पद पर बैठे व्यक्ति को रुकना पड़ रहा है, लेकिन राज्यपाल महोदय स्वयं बाबा जी की महिमा जानते थे, इसलिए वे शांत होकर बैठे रहे. बाद में जब बाबा जी ने उन्हें अंदर बुलाया, तो राज्यपाल महोदय ने बाबा के चरणों में नतमस्तक होकर आशीर्वाद लिया. बाबा ने मुस्कुराते हुए उनसे बहुत आत्मीयता से बात की. बातचीत के दौरान बाबा जी ने उन्हें अहसास कराया कि जब कोई व्यक्ति ईश्वर या किसी सिद्ध संत के द्वार पर आता है, तो उसे अपने पद, प्रतिष्ठा और गुरूर को बाहर छोड़कर आना चाहिए.









