जापान में 20 साल बाद क्यों तोड़ा जाता है यह मंदिर? वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

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टोक्यो। जापान में एक बेहद अनूठी और प्राचीन धार्मिक परंपरा है, जिसके तहत हर बीस साल में एक प्रसिद्ध मंदिर को तोड़कर उसी डिजाइन में नई इमारत बनाई जाती है। 'जिंगू मंदिर' के नाम से मशहूर इस विशाल धार्मिक परिसर को पुराना होने से बचाने के लिए समय-समय पर पुनर्निर्मित किया जाता है। शिंतो धर्म में इसे देश के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण स्थलों में गिना जाता है।

जिंगू मंदिर की संरचना और विशेषताएँ

जिंगू कोई अकेला मंदिर नहीं है, बल्कि यह 100 से अधिक छोटे-बड़े धार्मिक स्थलों का एक विशाल परिसर है। इसमें 'नाइकू' (इनर श्राइन) और 'गेकू' (आउटर श्राइन) सबसे प्रमुख माने जाते हैं। नाइकू को विशेष रूप से पवित्र माना जाता है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ जापानी शाही परिवार से जुड़ा एक पवित्र दर्पण रखा हुआ है। प्राचीन जापान से चली आ रही यह परंपरा करीब 1,300 वर्षों से अनवरत जारी है। हर 20 साल में नाइकू और गेकू के मुख्य मंदिरों के साथ-साथ 'उजी ब्रिज' का भी पुनर्निर्माण किया जाता है। इसके तहत पुरानी संरचना को हटाकर उसके ठीक बगल में स्थित निर्धारित खाली जगह पर परंपरागत शैली में नया मंदिर खड़ा किया जाता है, जिससे उसकी वास्तुकला और परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहती हैं। वर्ष 2013 में हुआ इसका पुनर्निर्माण इस परंपरा का 62वां संस्करण था, जबकि अगला बड़ा पुनर्निर्माण वर्ष 2033 में प्रस्तावित है, जिसकी तैयारियां और अनुष्ठान अभी से शुरू हो चुके हैं।

परंपरा का धार्मिक और व्यावहारिक महत्व

इस अनूठी परंपरा के पीछे गहरा दार्शनिक और व्यावहारिक अर्थ छिपा है:

  • शिंतो दर्शन: इसके माध्यम से प्रकृति के जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म और जीवन की अस्थिरता का संदेश दिया जाता है।

  • पारंपरिक ज्ञान का हस्तांतरण: पुनर्निर्माण प्रक्रिया के जरिए पुरानी पीढ़ी के कुशल कारीगर नई पीढ़ी को पारंपरिक लकड़ी की नक्काशी और निर्माण तकनीक सिखाते हैं।

  • ओकिहिकी उत्सव: मंदिर के निर्माण से पहले इस उत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों लोग जापानी साइप्रस यानी 'हिनोकी' की विशाल लकड़ियों (जो अक्सर 200 साल से अधिक पुराने पेड़ों से प्राप्त होती हैं) को खींचकर निर्माण स्थल तक पहुँचाते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में कई महीने या साल लग जाते हैं और धार्मिक अनुष्ठानों सहित इसका पूरा चक्र लगभग आठ साल तक चलता है। भारी भरकम खर्च वाले इस कार्य को सरकारी सहयोग और निजी दान के जरिए पूरा किया जाता है। माना जाता है कि यह परंपरा प्राचीन जापानी जीवनशैली से उपजी है, जहाँ लकड़ी के गोदाम और अन्य संरचनाएं समय-समय पर नए सिरे से बनाई जाती थीं।