रुचिका मालू ने क्यों छोड़ा CA बनने का सपना? अब दीक्षा लेकर बदलेंगी जीवन की दिशा

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बाड़मेर। चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) बनने का लक्ष्य रखने तथा स्नातकोत्तर (MA) तक शिक्षा प्राप्त करने वाली बाड़मेर की बेटी मुमुक्षु रुचिका मालू अब सांसारिक मोह-माया के जीवन का त्याग कर संयम की कठिन राह पर अग्रसर होने जा रही हैं। रविवार को वे आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन कर-कमलों से औपचारिक जैन दीक्षा ग्रहण करेंगी। बचपन से ही धार्मिक विचारों एवं संस्कारों से ओत-प्रोत मुमुक्षु रुचिका 'चारित्र अंगीकार' के संकल्प के साथ आत्म-कल्याण के मार्ग पर अपनी नई आध्यात्मिक पहचान स्थापित करने जा रही हैं।

परिवार से मिले बाल्यकाल में धार्मिक संस्कार

मुमुक्षु रुचिका मालू के अनुसार, उन्हें धर्म एवं नीति के संस्कार अपने परिवार से ही प्राप्त हुए हैं। बचपन से ही परिवार द्वारा यह सीख दी गई कि जीवन के प्रत्येक कार्य में धर्म का समावेश अनिवार्य है। बचपन के दिनों का स्मरण करते हुए उन्होंने बताया कि सामायिक (ध्यान एवं आत्मचिंतन) न करने पर उन्हें माताजी के अनुशासित व्यवहार का सामना करना पड़ता था। दादाजी एवं पिता प्रतिदिन उन्हें जिनालय (मंदिर) ले जाते थे।

उन्होंने बताया कि उनके दादाजी एवं पिता की हार्दिक इच्छा थी कि परिवार से कोई सदस्य संयम पथ का वरण करे, यद्यपि दादी जी उनकी सुकुमार पोती के इस कठिन मार्ग पर जाने को लेकर चिंतित रहती थीं।

दादी के देवलोकगमन के उपरांत ली दीक्षा की अनुमति

रुचिका ने बताया कि संयम पथ पर बढ़ने हेतु दादी जी को मनाना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था, क्योंकि इस विषय पर चर्चा होते ही उनका स्वास्थ्य प्रभावित हो जाता था। जुलाई 2021 में दादी जी के देवलोकगमन के उपरांत, परिजनों की सहर्ष सहमति से उन्होंने दीक्षा ग्रहण करने का अंतिम निर्णय लिया।

रुचिका के परिवार में उनके दादा मेवाराम मालू, पिता रूपेश मालू (व्यवसायी) तथा माता लीला देवी (गृहिणी) हैं। चार बहनों में वे सबसे ज्येष्ठ हैं।

'सीए' के सपने से 'चारित्र अंगीकार' तक का सफर

अपनी शैक्षणिक यात्रा के विषय में चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने सीए (Chartered Accountant) बनने के उद्देश्य से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। हालांकि, समय के साथ उन्हें बोध हुआ कि सांसारिक दिखावे के स्थान पर वास्तविक शांति आध्यात्मिक मार्ग में ही निहित है। उन्होंने कहा कि उनके लिए 'सीए' का वास्तविक अर्थ अब 'चारित्र अंगीकार' बन चुका है, जिसे वे अंगीकार करने जा रही हैं।

छात्रसंघ राजनीति से अध्यात्म तक की यात्रा

मुमुक्षु रुचिका ने बताया कि वर्ष 2015 में वे कन्या महाविद्यालय से छात्रसंघ चुनाव जीतकर उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुई थीं। चुनाव में उनकी घनिष्ठ मित्र पराजित हो गई थीं, जिससे उन्हें अत्यंत ग्लानि हुई और उन्होंने किसी को भी दुःख न पहुंचाने का संकल्प लिया।

तत्पश्चात, उन्होंने विगत पांच वर्षों तक लाडनूं स्थित पारमार्थिक शिक्षण संस्थान में रहकर गहन धार्मिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। इस दौरान पूज्य आचार्यों की निश्रा में उन्हें विभिन्न तप-साधना एवं पद-विहार का अवसर प्राप्त हुआ। समाज को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में मानवीय मूल्यों एवं सांस्कृतिक संस्कारों का संरक्षण सर्वोपरि है।