क्रीमी लेयर फैसले पर केंद्र ने जताई दिक्कत, सुप्रीम कोर्ट से दो साल की मोहलत मांगी

0
5

नई दिल्ली। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) क्रीमी लेयर निर्धारण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले को लागू करने को लेकर केंद्र सरकार ने अदालत से दो साल की मोहलत की मांग की है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इस फैसले के क्रियान्वयन से वर्तमान और पुरानी चल रही भर्ती प्रक्रियाओं पर किसी भी तरह का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। शीर्ष अदालत ने केंद्र की इस याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी है।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

बीते 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन' मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि केवल किसी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) या निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता के वेतन या आय को ही ओबीसी क्रीमी लेयर से बाहर करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया था कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए माता-पिता के पद और श्रेणी की स्थिति को 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन के अनुसार निर्धारित आय या संपत्ति परीक्षण के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए।

केंद्र सरकार की दलील और दो साल का समय मांगने की वजह

केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ के समक्ष आग्रह किया कि इस फैसले को भावी प्रभाव से लागू किया जाए। सरकार ने अदालत के समक्ष निम्नलिखित मुख्य तर्क रखे हैं:

  • भर्ती प्रक्रियाओं में बाधा रोकना: दो साल का समय मिलने से पुरानी और चालू भर्ती प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की रुकावट या व्यवधान नहीं आएगा।

  • प्रशासनिक अनिश्चितता दूर करना: इससे प्रशासनिक अनिश्चितताओं को दूर करने और विभिन्न हितधारकों के अधिकारों में संतुलन बनाने का अवसर मिलेगा।

  • विभिन्न अदालतों के मामले ट्रांसफर करना: सरकार ने अलग-अलग उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट या किसी एक उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए भी याचिका दायर की है।

सुचारु संक्रमण और न्यायसंगत क्रियान्वयन पर जोर

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि उसका मकसद सुप्रीम कोर्ट के मूल निर्णय को कमजोर करना या उसे पलटना नहीं है, बल्कि इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने के लिए एक सुचारु संक्रमण काल तैयार करना है। सरकार का मानना है कि इस समयावधि से सभी संबंधित पक्षों के हितों की रक्षा होगी और फैसले का प्रभावी तथा न्यायसंगत क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सकेगा।