SIR को लेकर ओवैसी ने ECI से मांगा जवाब, पूछा- फैसले सर्वसम्मति से हुए या बहुमत से?

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नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता को लेकर चल रहे सियासी घमासान के बीच एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर जोरदार हमला बोला है। ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के चयन के नए नियमों से लेकर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाए हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2023-24 में जब संबंधित कानून संसद में लाया गया था, तभी उनकी पार्टी ने चेताया था कि जिस तरह से सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त का चुनाव कर रही है, उससे लोकतांत्रिक संस्था की साख और जनता का भरोसा प्रभावित होगा।

चुनाव आयोग की चयन प्रक्रिया और बहुमत पर सवाल

असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन बोर्ड की संरचना पर सवाल उठाते हुए कहा कि चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कानून मंत्री और विपक्ष के नेता के शामिल होने से 2:1 का समीकरण बनता है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित होती है। इसके साथ ही उन्होंने आयोग द्वारा लिए गए आंतरिक फैसलों के तरीकों पर भी सवाल दागे। ओवैसी ने कहा कि आयोग के दो सदस्यों ने कई मुद्दों पर असहमति जताई है, ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्णय किस बहुमत से लिए गए। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग देश के सामने यह आंकड़े रखे कि उसने कितने फैसले पूर्ण सहमति से लिए और कितने बहुमत के आधार पर, क्योंकि बिना सर्वसम्मति के लिए गए फैसलों की वैधानिकता पर प्रश्न खड़ा होता है।

विशेष गहन पुनरीक्षण को बताया चोर दरवाजे से आया एनआरसी

एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया की कड़ी आलोचना करते हुए एआईएमआईएम सांसद ने इसकी तुलना राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) से की। ओवैसी ने कहा कि उन्होंने संसद में भी यह मुद्दा उठाया था कि एसआईआर कुछ और नहीं बल्कि 'चोर दरवाजे से लागू किया गया एनआरसी' है। तेलंगाना का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में एआईएमआईएम जमीन पर सक्रियता से काम कर रही है और वहां कभी एनआरसी या स्थायी निवास प्रमाणपत्र का मुद्दा इस तरह नहीं उठा था। उन्होंने परिवार रजिस्टर व्यवस्था पर भी निशाना साधा और कहा कि बिहार में आईं खामियों के बाद इस तरह की जटिल प्रक्रियाओं को पूरी तरह ऑनलाइन लागू करना अव्यवहारिक है।

ऑनलाइन व्यवस्था और बीएलओ की कार्यप्रणाली पर उठाए प्रश्न

ओवैसी ने प्रशासनिक और मैदानी स्तर पर चल रही गड़बड़ियों को रेखांकित करते हुए पूछा कि जब बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को घर-घर जाकर नोटिस बांटने हैं, तो आम लोगों पर ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करने का दबाव क्यों बनाया जा रहा है। दिल्ली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि लाखों मामलों में एक साथ ऑनलाइन काम, घर-घर सर्वेक्षण और दस्तावेज जुटाना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग मीडिया में उठे वाजिब सवालों का जवाब देने में नाकाम रहा है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद इस प्रक्रिया से पैदा हुई जमीनी समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।

गरीबों और भावी पीढ़ियों पर भारी आर्थिक व सामाजिक बोझ

संशोधन प्रक्रिया के सामाजिक प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए ओवैसी ने कहा कि एसआईआर के कारण देश की गरीब आबादी को सबसे अधिक मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। कागजात और दस्तावेज जुटाने के चक्कर में गरीबों को दर-दर भटकना पड़ रहा है, जिससे उनका स्वाभिमान आहत हो रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की कि जिन लोगों के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं, उनके बच्चों और अगली पीढ़ियों के नागरिक अधिकारों का क्या होगा। ओवैसी ने सवाल उठाया कि जब बुजुर्गों या माता-पिता के नाम ही सूची में दर्ज नहीं होंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपने वंश और नागरिकता का सत्यापन किस आधार पर करेंगी।