जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत की संपूर्ण कथा, चील और सियारिन वाली इस पौराणिक कथा से हर मनोकामना होती है पूरी

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जितिया व्रत का हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है. मान्यता है कि इस कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ करने से व्रती को संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना का आशीर्वाद प्राप्त होता है. जितिया व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए रखती हैं. व्रत कथा मातृत्व की श्रद्धा, त्याग और संकल्प की भावना को मजबूत करती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कथा सुनने से व्रत का आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है और भगवान जीमूतवाहन की कृपा से संतान पर आने वाले संकट दूर होने की कामना की जाती है. यहां पढ़ें संपूर्ण जितिया व्रत कथा के बारे में…
जितिया व्रत की संपूर्ण कथा | Jitiya Vrat Katha

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है. एक वन में एक चील और एक सियारिन रहती थीं और दोनों में गहरी मित्रता थी. एक दिन दोनों ने कुछ महिलाओं को जितिया व्रत करते और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करते देखा. उन्होंने इस व्रत के बारे में जानकारी प्राप्त की. व्रत के महत्व को जानकर दोनों ने भी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना से जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया. व्रत का दिन आया तो दोनों ने उपवास रखा और भगवान जीमूतवाहन का स्मरण किया.
चील ने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ व्रत रखा. उसने पूरे दिन संयम बनाए रखा और पूजा-पाठ में मन लगाया. दूसरी ओर, सियारिन से भूख सहन नहीं हुई. रात में उसे बहुत तेज भूख लगी और उसने व्रत का नियम तोड़ दिया. उसने भोजन कर लिया. इस प्रकार चील ने पूरी निष्ठा से व्रत पूरा किया, जबकि सियारिन व्रत का पालन नहीं कर सकी. समय बीतने के बाद दोनों ने मनुष्य योनि में जन्म लिया. मान्यता के अनुसार, चील का जन्म एक धर्मपरायण स्त्री के रूप में हुआ और सियारिन का जन्म भी एक स्त्री के रूप में हुआ और दोनों बहनें बनीं. बड़ी बहन के रूप में चील का पुनर्जन्म हुआ और छोटी बहन के रूप में सियारिन का.
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बड़ी बहन का विवाह एक राजपरिवार में हुआ, जबकि छोटी बहन का विवाह भी एक संपन्न परिवार में हुआ. दोनों के जीवन में संतान का सुख आया. बड़ी बहन जितिया व्रत की महिमा और नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करती थी. वह अपनी संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए नियमित रूप से व्रत रखती थी. छोटी बहन के जीवन में कई बार संतान से जुड़ी परेशानियां आने लगीं. उसकी संतानें जन्म लेने के बाद अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाती थीं. इससे वह बहुत दुखी रहने लगी.
एक दिन उसने अपनी बड़ी बहन से इसका कारण पूछा. तब बड़ी बहन ने उसे पूर्वजन्म की बात और जितिया व्रत के महत्व के बारे में बताया. उसने समझाया कि व्रत केवल भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि श्रद्धा, संयम, नियम और संकल्प के साथ भगवान जीमूतवाहन का स्मरण करना इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है. छोटी बहन को अपनी भूल का एहसास हुआ. उसने श्रद्धापूर्वक भगवान जीमूतवाहन की आराधना करने और विधि-विधान से जितिया व्रत रखने का संकल्प लिया.
कथा के अनुसार, भगवान जीमूतवाहन त्याग, करुणा और संतान की रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं. उनकी कृपा से संतान की रक्षा और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है. इसी कारण माताएं जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख और सुरक्षा की कामना से रखती हैं. व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और व्रत कथा का श्रवण किया जाता है.

हे भगवान जीमूतवाहन! जिस प्रकार आपने अपने भक्तों और उनकी संतानों की रक्षा की, उसी प्रकार सभी माताओं की संतानों को स्वस्थ, दीर्घायु और सुखी रखें.