नई दिल्ली: अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर चल रहा विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों और चुनाव आयोग को एक तय समय-सीमा के भीतर इस विवाद को सुलझाने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश और समय-सीमा
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अहम आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों तृणमूल गुटों को भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के समक्ष अपनी कार्यवाही और पक्ष रखने की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने चुनाव आयोग को भी यह निर्देश दिया है कि कार्यवाही पूरी होने के बाद अगले चार महीने के भीतर इस पूरे विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुनाया जाए।
चुनाव आयोग का अंतरिम फैसला और नए नाम-चिन्ह
गौरतलब है कि आगामी उपचुनावों के मद्देनजर 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने मूल पार्टी की पहचान को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया था। इसके बाद दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए गए थे। चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम दिया है और उन्हें ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ का चुनाव चिन्ह आवंटित किया है। वहीं, दूसरी ओर प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ के रूप में मान्यता दी गई है और उन्हें ‘लिफाफा’ का चुनाव चिन्ह दिया गया है। चुनाव आयोग की यह व्यवस्था फिलहाल आगामी उपचुनावों पर लागू रहेगी, जिसमें पश्चिम बंगाल की बहुचर्चित नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव भी शामिल हैं।









