नई दिल्ली| देश भर में इस बार खरीफ सीजन की फसलों के बुवाई क्षेत्र (रकबे) में आए उतार-चढ़ाव का सीधा और व्यापक असर आने वाले महीनों में आम आदमी की रसोई और खुदरा बाजारों पर पड़ना तय माना जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय की हालिया राष्ट्रीय रबी कॉन्फ्रेंस में सामने आए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल जहाँ मक्का, सोयाबीन, धान, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख व्यावसायिक एवं खाद्य फसलों के रकबे में खासी गिरावट दर्ज की गई है, वहीं कुछ चुनिंदा दलहन और मोटे अनाजों के दायरे में संतोषजनक बढ़ोतरी भी देखने को मिली है। फसल उत्पादन के आधिकारिक आँकड़े और इस सीजन का पहला अग्रिम अनुमान अक्टूबर के मध्य तक आने की संभावना जताई जा रही है, किंतु शुरुआती कृषि रुझानों ने बाजार में हलचल तेज कर दी है।
प्रमुख फसलों के रकबे में गिरावट और इसके संभावित प्रभाव
इस खरीफ सीजन के दौरान कई अहम फसलों के बुवाई क्षेत्र में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है:
धान: धान का रकबा 438.19 लाख हेक्टेयर से घटकर 421.82 लाख हेक्टेयर पर आ गया है, यानी इसमें 16.37 लाख हेक्टेयर की बड़ी कमी आई है। इससे देश के कुल चावल उत्पादन पर असर पड़ना तय है। पूर्व की एक रिपोर्ट में देश में करीब एक करोड़ टन कम चावल पैदा होने की आशंका जताई गई थी, जिसका सीधा असर घरेलू कीमतों और खाद्य निर्यात दोनों पर पड़ सकता है।
मक्का: मक्का का रकबा 94.08 लाख हेक्टेयर से घटकर 91.09 लाख हेक्टेयर (2.99 लाख हेक्टेयर की कमी) रह गया है। मक्का का उपयोग केवल मानवीय उपभोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पोल्ट्री (मुर्गी पालन) और स्टार्च उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है, जिससे इसके दाम बढ़ने की आशंका है।
सोयाबीन: इसका रकबा 122.98 लाख हेक्टेयर से घटकर 121.82 लाख हेक्टेयर (1.16 लाख हेक्टेयर की कमी) दर्ज किया गया है। इससे घरेलू स्तर पर खाद्य तेलों के उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। हालाँकि, सरकार द्वारा हाल ही में खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाए जाने से आयात के माध्यम से बाजार की आपूर्ति को संतुलित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
कपास एवं गन्ना: कपास का रकबा 109.87 से घटकर 109.17 लाख हेक्टेयर (0.69 लाख हेक्टेयर कम) तथा गन्ने का रकबा 58.87 से घटकर 58.47 लाख हेक्टेयर (0.40 लाख हेक्टेयर कम) रह गया है। कपास उत्पादन घटने से वस्त्र (टेक्सटाइल) उद्योग की लागत में इजाफा हो सकता है।
दालों और मोटे अनाजों के मोर्चे पर राहत भरी खबरें
एक तरफ जहाँ कई खाद्यान्न फसलों का रकबा घटा है, वहीं दूसरी तरफ दालों और पौष्टिक मोटे अनाजों के क्षेत्र में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई है:
उड़द: उड़द की बुवाई 22.46 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 25.15 लाख हेक्टेयर हो गई है, जिसमें लगभग 11.9% यानी 2.68 लाख हेक्टेयर की शानदार बढ़ोतरी हुई है।
तुअर (अरहर): इसका दायरा 44.93 से बढ़कर 45.66 लाख हेक्टेयर (0.72 लाख हेक्टेयर की वृद्धि) पर पहुँच गया है।
बाजरा और सूरजमुखी: बाजरे का रकबा 62.87 से बढ़कर 64.86 लाख हेक्टेयर (1.99 लाख हेक्टेयर की वृद्धि) हो गया है, जिससे मोटे अनाजों की उपलब्धता मजबूत होगी। इसके अलावा, सूरजमुखी का रकबा 0.64 लाख हेक्टेयर से लगभग दोगुना होकर 1.25 लाख हेक्टेयर पर पहुँच गया है, जो खाद्य तेल बाजार के लिए एक शुभ संकेत है।
अग्रिम अनुमान आने में क्यों हो रही है देरी?
सामान्य परिस्थितियों में खरीफ फसलों का पहला अग्रिम अनुमान सितंबर माह के अंतिम सप्ताह तक जारी कर दिया जाता है, किंतु इस बार इसमें मामूली विलंब हो रहा है। इसके मुख्य कारण के रूप में यह बात सामने आई है कि महाराष्ट्र सहित लगभग 10 राज्यों ने अभी तक अपने अंतिम फसल अनुमान केंद्रीय कृषि मंत्रालय को प्रेषित नहीं किए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मंत्रालय ने संबंधित सभी राज्यों को एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है, ताकि अक्टूबर के मध्य तक पूर्णत: सटीक और प्रामाणिक आँकड़े देश के सामने रखे जा सकें। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते आयात और सरकारी बफर स्टॉक के जरिए आपूर्ति के इन समीकरणों को नहीं संभाला गया, तो आने वाले दिनों में आम उपभोग की कई वस्तुएँ और अधिक महँगी हो सकती हैं।









