लखनऊ | उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान होने में अभी वक्त बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी कमर कसते हुए अभी से मैदान संभाल लिया है। पिछले कई विधानसभा चुनावों की तरह आगामी चुनाव भी सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण कांग्रेस के लिए रहने वाला है। राज्य के जमीनी स्तर पर कांग्रेस अपनी स्थिति उस मजबूत रूप में स्थापित नहीं कर पाई है कि वह अपने दम पर अकेले चुनाव लड़कर कोई बेहतर परिणाम दे सके। ऐसी स्थिति में उसे एक बार फिर समाजवादी पार्टी (SP) का सहारा लेना ही पड़ेगा।
गठबंधन की गणित और सपा का भारी पलड़ा
गत लोकसभा चुनावों में सपा-कांग्रेस गठबंधन का परिणाम काफी बेहतर रहा था, जिसके चलते आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी इस गठबंधन की एक बार फिर कड़ी परीक्षा होगी। हालांकि, इस पूरे समीकरण में सपा का पलड़ा लगातार भारी दिखाई देता है। इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई ठोस कारण हैं, और यही वजह है कि कांग्रेस को सपा की अधिक आवश्यकता महसूस होती है।
तुलनात्मक रूप से सपा के जमीनी कार्यकर्ता कांग्रेस की तुलना में अधिक सक्रिय और वैचारिक रूप से समर्पित हैं। कांग्रेस के पास जहाँ एक तरफ समर्पित कार्यकर्ताओं का लगातार अभाव रहा है, वहीं राज्य स्तर पर ऐसा कोई प्रभावी चेहरा या नेता भी नहीं बचा है जिसकी पूरे प्रदेश में व्यापक अपील हो। राष्ट्रीय स्तर पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की सभाओं में भीड़ अवश्य जुटती है, लेकिन वह भीड़ संगठित वोटों में तब्दील नहीं हो पाती, जैसा कि पिछले कई चुनावों के परिणामों से स्पष्ट होता रहा है।
एक दशक में कांग्रेस की सीटों का ग्राफ
| राजनीतिक दल (Party) | 2007 चुनाव सीटें | 2012 चुनाव सीटें | 2017 चुनाव सीटें | 2022 चुनाव सीटें |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 51 | 47 | 312 | 255 |
| समाजवादी पार्टी (SP) | 97 | 224 | 47 | 111 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 206 | 80 | 19 | 1 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 22 | 28 | 7 | 2 |
| अपना दल (सोनेलाल) | 0 | 0 | 9 | 12 |
| राष्ट्रीय लोक दल (RLD) | 10 | 9 | 1 | 8 |
| सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी | 0 | 0 | 4 | 6 |
| निषाद पार्टी | – | – | 1 | 6 |
| जनसत्ता दल लोकतांत्रिक | – | – | – | 2 |
| अन्य एवं निर्दलीय | 17 | 15 | 3 | 0 |
| कुल सीटें | 403 | 403 | 403 | 403 |
बदलता राजनीतिक समीकरण और नरेटिव की जंग
अब उत्तर प्रदेश का चुनावी मुकाबला पारंपरिक रूप से त्रिकोणीय या बहुकोणीय नहीं रह गया है। मुख्य मुकाबला सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सपा की अगुआई वाले गठबंधनों के बीच ही सिमटता नजर आ रहा है, जबकि बहुजन समाज पार्टी (BSP) मुकाबले से लगभग बाहर हो चुकी है। ऐसे में सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कम्बेंसी) का सीधा फायदा सपा को मिलने की पूरी संभावना है।
कांग्रेस राजनीतिक एजेंडा और नरेटिव गढ़ने के मामले में भी सपा से काफी पीछे चल रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नया राजनीतिक फॉर्मूला देकर सामाजिक समीकरण साधने का एक प्रभावी नरेटिव खड़ा किया है, जबकि कांग्रेस के पास राज्य स्तर पर ऐसा कोई विशिष्ट स्थानीय नरेटिव नहीं है। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में भी अमूमन वही राष्ट्रीय मुद्दे उठाते हैं जो वे देश के अन्य हिस्सों में उठाते हैं, और ये राष्ट्रीय मुद्दे आम जनता को स्थानीय स्तर पर सीधे तौर पर पार्टी से जोड़ नहीं पाते।
लोकसभा चुनाव के नतीजे और भविष्य की चुनौतियाँ
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदर्शन को देखते हुए सपा और कांग्रेस दोनों के ही हौसले बुलंद हैं। वर्ष 2024 में राज्य से बीजेपी के सांसदों की संख्या 62 से घटकर सीधे 33 पर आ गई थी। हालाँकि, यह पूरी तरह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि लोकसभा चुनाव वाले फैक्टर्स विधानसभा चुनाव में भी उतने ही असरदार साबित होंगे, लेकिन यदि ऐसा होता है तो इसका सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ सपा को ही मिलेगा, जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी देखा गया था जहाँ सपा के रिकॉर्ड 37 उम्मीदवार जीते थे और कांग्रेस को भी छह सीटों पर सफलता मिली थी, जो वर्ष 2009 के बाद उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।
इसके विपरीत, वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस का गठबंधन अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका था, तब सपा को 47 और कांग्रेस को मात्र सात सीटें मिली थीं। वहीं, 2022 में जब दोनों दल अलग-अलग लड़े थे, तब सपा ने 111 सीटें जीती थीं जबकि कांग्रेस सिमटकर केवल दो सीटों पर रह गई थी। वर्तमान में बसपा की स्थिति भी बेहद कमजोर है और उसका लोकसभा या विधानसभा में कोई प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं बचा है। उसके कमजोर होने का लाभ सबसे पहले बीजेपी को मिला, उसके बाद सपा को और फिर कांग्रेस को, जिसके चलते रणनीतिक रूप से सपा का साथ कांग्रेस के लिए अनिवार्य बन गया है।









