नई दिल्ली: ईरान युद्ध के कारण दुनियाभर में कच्चे तेल की किल्लत और बढ़ती कीमतों से लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इस बीच, हर किसी की निगाहें ओपेक प्लस (OPEC+) के फैसले पर टिकी थीं, जहां संगठन के सात प्रमुख देशों ने नवंबर महीने के लिए तेल उत्पादन को मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का बड़ा फैसला लिया है। यानी अगले महीने न तो तेल का उत्पादन बढ़ाया जाएगा और न ही इसमें कोई कटौती की जाएगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं।
क्या है कीमतों में तेजी की वजह?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार आ रही इस तेजी की सबसे बड़ी वजह ईरान से जुड़ा युद्ध और उससे प्रभावित होने वाली तेल की सप्लाई है। मध्य पूर्व से तेल की आवाजाही में भारी रुकावट के चलते वैश्विक बाजार में आपूर्ति को लेकर गहरी चिंता बनी हुई है। खासतौर पर 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की स्थिति ने तनाव को और बढ़ा दिया है, क्योंकि यह दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक है। 5 अक्टूबर की सुबह ब्रेंट क्रूड करीब 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, जबकि शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत 103 डॉलर के पार भी पहुंच गई थी।
जी7 (G7) देशों ने उठाया बड़ा कदम
तेल की बढ़ती कीमतों और गहराते सप्लाई संकट को देखते हुए जी7 (G7) देशों ने भी बाजार में हस्तक्षेप करने का बड़ा फैसला लिया है। ये देश अपने रणनीतिक भंडार से लगभग 10 करोड़ बैरल तेल और ईंधन बाजार में उतारने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। इस प्रक्रिया की शुरुआत डीजल से होगी और इसकी पहली खेप अगले कुछ हफ्तों में बाजार में आने की उम्मीद है। इसका मुख्य उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों पर पड़ रहे दबाव को कम करना है। हालांकि, ओपेक प्लस द्वारा उत्पादन न बढ़ाने का फैसला सप्लाई को लेकर चिंता को बरकरार रख सकता है।
आगे क्या रहेगा रुख?
फिलहाल वैश्विक तेल बाजार की पूरी नजर ईरान युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और मध्य पूर्व से होने वाले निर्यात पर टिकी हुई है। यदि तेल की आपूर्ति में और अधिक बाधा आती है, तो कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव फिर से बढ़ सकता है। वहीं, जी7 का अतिरिक्त तेल बाजार में आने से कीमतों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। अब इस मामले में अगली बड़ी हलचल 1 नवंबर को होने वाली ओपेक प्लस की बैठक के बाद ही देखने को मिलेगी।









