दानिश कनेरिया ने UN मानवाधिकार संगठन को घेरा, पाकिस्तान-बांग्लादेश का मुद्दा उठाकर सुनाई खरी-खोटी

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पाकिस्तान के पूर्व दिग्गज लेग स्पिनर दानिश कनेरिया ने भारत का बचाव करते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) मानवाधिकार संगठन की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार किया है। कनेरिया ने भारत में हाल ही में हुए विरोध-प्रदर्शनों और उसके बाद की गई प्रशासनिक कार्रवाई पर यूएन मानवाधिकार संगठन द्वारा जताई गई चिंता की कड़ी निंदा की है। इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में वहां के हिंदू व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हो रहे लगातार अत्याचारों का हवाला देते हुए संयुक्त राष्ट्र से सवाल किया कि वह इन गंभीर मामलों पर अपनी चुप्पी कब तोड़ेगा।

क्या है पूरा मामला?

गत शनिवार को दिल्ली में हुए व्यापक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों की धरपकड़ पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने गहरी चिंता व्यक्त की थी। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के प्रवक्ता थमीन अल-खीथान ने एक बयान जारी कर दिल्ली में प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान हुई सामूहिक हिरासत की खबरों पर चिंता जताई थी। साथ ही, उन्होंने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और प्रदर्शन करने के अधिकार का पूरा सम्मान सुनिश्चित करने की अपील की थी। यूएन ने यह भी कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध कानून की कसौटी पर खरे उतरने चाहिए।

दानिश कनेरिया ने दुनिया के सामने रखा दोहरा मापदंड

पूर्व क्रिकेटर दानिश कनेरिया ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के इस रविदे पर कड़ा ऐतराज जताते हुए पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति का मुद्दा उठाया। कनेरिया ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर यूएन मानवाधिकार संगठन की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, "यूएन मानवाधिकार संगठन अपनी यह सुविधाजनक चुप्पी कब तोड़ेगा? क्या वह पाकिस्तान और बांग्लादेश में सुनियोजित हिंसा का सामना कर रहे हिंदू अल्पसंख्यकों तथा चीन में दमन झेल रहे उइगर मुसलमानों के पक्ष में कभी आवाज उठाएगा?"

भारत सरकार ने भी यूएन की टिप्पणी पर दिया था करारा जवाब

इससे पहले, दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय द्वारा की गई टिप्पणी पर भारत सरकार ने बेहद कड़ी नाराजगी जताई थी। भारत ने स्पष्ट शब्दों में इसे देश के आंतरिक मामलों में पूरी तरह अनुचित हस्तक्षेप करार दिया था। भारत ने दो टूक कहा था कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा सुरक्षित है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानूनी प्रतिबंध भी उतने ही आवश्यक हैं। भारत ने याद दिलाया कि देश में एक मजबूत, स्वतंत्र न्यायपालिका और सक्रिय मीडिया प्रणाली मौजूद है, जो हर नागरिक के मौलिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा करती है।

दिल्ली में सुरक्षा पाबंदियां और नेताओं की हिरासत

उल्लेखनीय है कि दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए दिए गए अनुमति आवेदन को अस्वीकार कर दिया था, जिसके बाद राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए गए थे। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए इंटरनेट, मेट्रो, बस और रेल सेवाओं पर अस्थायी पाबंदियां लगाई गई थीं। इसी कड़ी में, मुंबई से दिल्ली पहुंचे सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके और उनके दो साथियों सौरव दास तथा आशुतोष रांका को विमान से उतरते ही हिरासत में ले लिया गया था। हालांकि, बाद में कानूनी प्रक्रियाओं के तहत अधिकांश लोगों को रिहा कर दिया गया और अदालत ने दिपके व उनके साथियों को सशर्त जमानत दे दी।