Saturday, December 10, 2022
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श्रीराम एवं श्रीरामकथा की प्रासंगिकता

राम चरित सत कोटि अपारा।
श्रुति सारदा न बरनै पारा।।
(श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड ५२ (क))।
यह प्रसिद्ध उक्ति रामायण के सम्बन्ध में प्रचलित है तथा चरितार्थ भी है कि जो रामायण में नहीं है वह विश्व में भी नहीं है क्योंकि  
रामायण (श्रीरामकथा) केवल भारत की ही धरोहर नहीं है अपितु वह मानव मात्र की महिमा का गुणगान करने वाली विश्वव्यापी कृति है। यह देश काल और व्यक्ति की परिकल्पित सीमाओं से परे है।
राम शब्द में रमणीयता है और 'अयनÓ शब्द में जो गतिशीलता है- दोनों का मणि-कांचन संयोग ही रामायण (श्रीरामकथा) है। एक और महत्वपूर्ण विशेषता इस 'अयनÓ की यह है कि केवल राम का एकांगी अयन नहीं है, वरन् यह सीताजी और श्रीरामजी का समन्वित और समेकित अयन है। रामायण शब्द में ही यह समन्वयवादी भावना-विचारधारा है। देखा जाय तो वास्तव में यह श्रीराम और रामा (सीताजी) दोनों का अयन है। महर्षि वाल्मीकिजी ने सीताजी के लिए 'रामाÓ शब्द का प्रयोग किया है।
श्रीरामकथा वर्तमान भारतीय जन-जीवन के साथ इतनी निकटता से जुड़ी और गूँथी हुई है। जैसे वह उसका अन्न-पान अथवा जलवायु हो। साधारण जन के दैनंदिनी जीवन में ऐसी घटना नहीं घटती है, जिसमें श्रीरामकथा का कोई प्रसंग याद नहीं आता हो। सुख में, दु:ख में, संयोग में, वियोग में, भोग में, रोग में, त्याग में जीवन की हर क्षण अनुभूति में श्रीरामकथा की कोई न कोई बात अनायास जुड़ जाती है। प्राणों की चिन्ता किए बिना अपने दिए गए वचन का विधिवत पालन करने वाले आदर्श व्यक्ति को देखकर सत्यसंघ महाराजा दशरथजी का स्मरण हो जाता है। आदर्श पुत्र हो तो श्रीराम जैसा, साध्वी पत्नी हो तो सीताजी जैसी होनी चाहिए, अनुरागी भाई हो तो लक्ष्मण जैसा होना चाहिए। स्वार्थ रहित राजा (शासक) हो तो भरतजी जैसा होना चाहिए, पूर्ण समर्पित सेवक हो तो हनुमान्जी जैसा होना चाहिए। इसी प्रकार श्रीरामकथा के अनेक पात्रों को कई बराबर स्मरण करते हुए भारतवासी अपने जीवन में आदर्श गुणों को प्रतिष्ठित करने का भरपूर प्रयत्न करते हैं।
भारत के ही नहीं अपितु विश्वभर के प्रसिद्ध विद्वानों ने श्रीरामचरितमानस एवं श्रीराम के चरित्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अयोध्यासिंह उपाध्याय ने इसकी विशेषता के सम्बन्ध में कहा है-
कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला।
इसी प्रकार राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-
यह मानस आदर्श तुम्हारा, मनस्ताप सब हट जाता है।
उसमें रामचरित रसधारा, पाप आप ही हट जाता है।
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भी लिखा है-
सियाराम, हनुमान और भरत को छोड़कर हमारी कोई गति नहीं। हमारे मन की शान्ति, हमारा सब कुछ उन्हीं के ध्यान में निहित है। उनकी पुण्य कथा हमारे पूर्वजों की धरोहर है। इसी के आधार पर हम आज जीवित हैं। जब तक हमारी भारत भूमि में गंगा और कावेरी प्रवाहमान है, तब तक सीता-राम की कथा भी आबाल स्त्री पुरुष, सबमें प्रचलित रहेगी, माता की तरह हमारी जनता की रक्षा करती रहेगी।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ. राजेन्द्रप्रसाद एवं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीजी के अपने अमूल्य विचारों को सदैव स्मरण करते रहना चाहिए। अनेक विदेशी विद्वानों ने श्रीरामचरितमानस को विश्व का सर्वोत्कृष्ट महाकाव्य निरूपित किया है। यह हमारे लिए गौरव की बात है।
प्रसिद्ध इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने 'अकबर द ग्रेट मुगलÓ में उल्लेख किया है कि तुलसीदास उस युग के महानतम पुरुष थे। स्मिथ ने यह भी कहा है कि यह कहना उचित है कि तुलसी के काल में अकबर था न कि अकबर के काल में तुलसी थे।
कामिल बुल्के रोमन कैथोलिक संघ के प्रसिद्ध धर्म प्रचारक थे। वे धर्म प्रचार के लिए १९३५ में भारत आए तथा उन्होंने 'रामकथा उदभव और विकासÓ पर डी. फिल किया। उन्होंने उनके देश बेल्जियम में ही एक जर्मन ग्रन्थ में पढ़ा।
धन्य जनम जग, तीतल तासू।
पितहि प्रमोद चरित सुन जासु।।
बस फिर क्या था? वे श्रीरामचरितमानस की कथा पर मुग्ध हो गए। भारत में आ जाने के पश्चात् उन्होंने जीवनभर हिन्दी की सेवा की। कामिल बुल्के श्रीरामचरितमानस के अनन्य उपासक भक्त थे।
आज भी हम देखते हैं कि दक्षिण पूर्व एशिया की संस्कृतियों के मूल में श्रीरामकथा विशेषत: प्रतिष्ठित है। थाईलैण्ड, कम्बोडिया, मलेशिया, इण्डोनेशिया, लाओस, म्यामार में श्रीरामकथा के दर्शन प्राप्त होते हैं। भारतीय मजदूरों ने गिरमिटिया के रूप में श्रीरामचरितमानस और हनुमान चालीसा अपने साथ ले जाकर मारिशस, फीजी, सूरिनाम आदि में उनको जीवन का आधार ही बना लिया। आज भी मारिशस को लघुभारत के नाम से जाना जाता है। इण्डोनेशिया मुस्लिम देश है किन्तु वहाँ रामायण संस्कृति जन-जन में घुली-बसी लगती है। इण्डोनेशिया में श्रीरामकथा के प्रचार और प्रसार का सम्पूर्ण श्रेय उड़ीसा राज्य के भारतीय व्यापारियों को है। जो व्यापार करने वहाँ जाते थे तथा रामायण साथ ले जाते थे। आज भी इण्डोनेशिया में योगेश्वरकृत 'ककाविनÓ रामायण जन-जन में अत्यन्त ही लोकप्रिय है। वहाँ के शासक वर्ग शपथ विधि समारोह में शपथ ग्रहण के समय 'ककाविनÓ में वर्णित उन आठ व्रतों को ग्रहण करते हैं, जो श्रीराम के आदेशानुसार विभीषण ने राज्याभिषेक के समय ग्रहण किए थे। इण्डोनेशिया के जावा प्रान्त में प्राय: सभी जनता मुसलमान है किन्तु रामायण संस्कृति विशेष रूप से परिलक्षित एवं जीवित है। इतना ही नहीं इण्डोनेशिया के बाली द्वीप की नृत्य नाट्य प्रदर्शनी में श्रीरामकथा का मंचन होता रहता है। इण्डोनेशिया में १३६७७ द्वीप हैं किन्तु समस्त द्वीप राममय हैं तथा रामकथा सर्वत्र राष्ट्रीय जीवन में ओत-प्रोत दिखाई देती है। मलेशिया, कम्बोडिया तथा बर्मा में रामायण परम्परा है तथा उनके भिन्न-भिन्न रूप हैं।
रहीम की राम भक्ति भी प्रसिद्ध है। उनकी गोस्वामी तुलसीदासजी से घनिष्ठता भारत में सर्वविदित है। यथा-
गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव।
रहिमन जगत उधार को, और कछु न उपाय।
इस तरह श्रीराम की भक्ति ही संसार-सागर में उद्धार पा जाने का एक मात्र ही शरणागति उपाय है।
अवध के नवाब वाजिद अली शाह कहते थे-
हमेशा हे अवधनन्दन, तुम्हारी छवि का दर्शन हो।
इस प्रकार श्रीरामकथा निश्चित रूप से सर्वकालिक एवं सार्वजनिक है। श्रीराम और श्रीरामकथा सबके लिए है।
डॉ. सर मोहम्मद इकबाल ने श्रीराम के बारे में लिखा है-
है राम के वजूद पै हिन्दोस्ताँ को नाज़।
अहल ए नजर समझते हैं उन्हें इमाम ए हिन्द।
ब्रह्माजी ने महर्षि वाल्मीकि को वरदान देकर कहा- पुण्यमयी मनोरम कथा कहो। पृथ्वी पर जब तक गिरि और सरिताएँ हैं, तब तक श्रीरामकथा लोकों में प्रचारित होती रहेगी यथा-
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम्।
यावत् स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्च महीतले।।
तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति।
यावद् रामस्य च कथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति।।
वाल्मीकि रामायण बाल ३५ ३६-३७
ब्रह्माजी ने वाल्मीकिजी से कहा कि तुम श्रीरामचन्द्रजी की परम् पवित्र एवं मनोरम कथा को श्लोकबद्ध करके रचना करो। इस पृथ्वी पर जब तक नदियों और पर्वतों की सत्ता रहेगी, तब तक संसार में रामायण की कथा का प्रचार होता रहेगा। जब तक तुम्हारी बनाई हुई रामायण का (श्रीरामकथा) तीनों लोकों में प्रचार रहेगा।
वाल्मीकिजी ने नारदजी से पूछा कि हे मुनि! इस समय इस संसार में गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता और दृढ़ प्रतिज्ञ कौन है? सदाचार से युक्त समस्त प्राणियों का हित साधक विद्वान, सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन पुरुष कौन है?
मन पर अधिकार रखने वाला, क्रोध को जीतने वाला कान्तिमान और किसी की भी निन्दा नहीं करने वाला कौन है? तथा संग्राम में कुपित (क्रोधित) होने पर जिससे देवता भी डरते हैं? महर्षे मैं यह सुनना चाहता हूँ इसके लिए मुझे बड़ी उत्सुकता है और आप ऐसे महापुरुष को जानने में समर्थ हैं।
महर्षि वाल्मीकि ने इन वचनों को सुनकर तीनों लोकों का ज्ञान रखने वाले नारदजी ने उन्हें सम्बोधित करके कहा- अच्छा सुनिये और फिर प्रसन्नतापूर्वक बोले-
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणा:।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्त: श्रूयतां नर:।।
इक्ष्वाकुवंश प्रभवो रामो नाम जनै: श्रुत:।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी।।
वाल्मीकि रामायण बाल. १-७-८
मुने! आपने जिन दुर्लभ गुणों का वर्णन किया है, उनसे युक्त पुरुष को मैं विचार करके कहता हूँ आप सुने। इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगों में राम नाम से विख्यात हैं वे ही मन् को वश में रखने वाले, महाबलवान् कान्तिमान, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं। वे बुद्धिमान नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रुसंहारक है।
इस प्रकार वे धर्म के ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ तथा प्रजा के हित साधन में लगे रहने वाले हैं। वे यशस्वी इतनी पवित्र, जितेन्द्रिय और मन को एकाग्र रखने वाले हैं।
सर्वदाभिगत: सद्भि: समुद्र इव सिन्धुभि:।
आर्य: सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शन:।।
वाल्मीकि रामायण बाल १-१६
जैसे नदियाँ मिलती हैं, उसी प्रकार सदा श्रीराम से साधु पुरुष मिलते रहते हैं। वे आर्य एवं सबमें समान भाव रखने वाले हैं, उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालुम होता है।
इस प्रकार श्रीराम में अनेक गुण हैं अत: आज भी हर परिवार कहता है कि बेटा (पुत्र) हो तो राम जैसा। जिन परिवारों में रामायण के आदर्शों का अनुसरण एवं आचरण होता है वहाँ सुख, समृद्धि और शान्ति की स्थापना हो जाती है, जिन परिवारों में रामायण के आदर्श नहीं होते हैं, वहाँ महाभारत हो जाता है अर्थात् परस्पर युद्ध और विनाश हो जाता है। श्रीराम का अर्थ है प्रेम और त्याग का जीवन। आज हमें परिवार में श्रीराम की नितान्त आवश्यकता है तभी परिवार सुखी समृद्ध और शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेगा।
अन्त में श्रीराम के गुण एवं चरित्र के बारे में श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने जो वर्णन किया है वह हमें सदैव याद रखना चाहिए।
कहाँ कहाँ लगि नाम बड़ाई।
रामु न सकहि नाम गुन गाई।।
श्रीरामचरितमानस बाल. २६-४
संदर्भ ग्रन्थ : १. श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी गीता प्रेस गोरखपुर
२. श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण। गीता प्रेस गोरखपुर।
३. रामकथामृत- शिवानन्द सर्वसेवा संघ- प्रकाशन राजघाट, वाराणसी- २२१ ००१

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