Wednesday, May 22, 2024
Homeधर्ममनुष्‍य में चेतना के तीन स्‍तर

मनुष्‍य में चेतना के तीन स्‍तर

मनुष्य में चेतना के तीन प्रमुख स्टेज, बताए गए है। पहला स्तर है जीवात्मा, दूसरा आत्मा, तीसरा परमात्मा। आत्मा और परमात्मा उपर के स्तर हैं। जो मनुष्य प्राप्त कर सकता है। चेतना की शुद्ध अवस्था को आत्मा व परम शुद्ध स्वरूप को परमात्मा कहते हैं। कृष्ण कहते है कि, परमात्मा आत्मा के रूप में मौजूद है और आत्मा, जीवात्मा के रुप में मौजूद है, चेतना के रुप में मौजूद है। यदि कोई कहे कि, यदि आत्मा और परमात्मा मौजूद है तो ,हमें दिखाई क्यों नहीं पडते ? इसका उत्तर है कि ये हमारी चेतना के संभावित स्तर है, मनुष्य इन उच्च स्तरों पर पहुंच कर, इनको देख सकता है, जान सकता है। क्या साधारण मनुष्य इन स्तरों पर पहुंच सकता है? उत्तर है नहीं। साधारणतः मनुष्य की पहुंच, इन स्तरो तक नहीं होती। मनुष्य की चेतना, तीन गुण व तीन शरीरों से बद्ध रहती है ,उपर नहीं उठ सकती है । चेतना को उपर उठाने के लिए, तीनों गुणों से उपर उठना होता है। मनुष्य इन तीन गुण को तभी पार कर सकता है, जब उसके पास शक्ति हो। शक्ति उपलब्ध हो जाने पर, मनुष्य की चेतना, स्थूलता छोड़कर, सूक्ष्म होकर, तीनों गुणों के पार चली जाती है। चेतना शुद्ध हो जाती है, आत्मा स्वरूप हो जाती है। शुद्ध चेतना ,अब अगला उच्च स्तर ,परमात्मा की ओर जा सकती है। संत महात्मा लोग शक्ति की उपासना करते रहते हैं । परमात्मा की शक्ति, मनुष्य की चेतना उठा देती है। ऐसा ही एक शक्ति साधना का पर्व, कल से प्रारंभ हो रहा है। सभी मनुष्यों को इन नौ दिनो मे शक्ति उपासना करनी चाहिए और जीवन भर करनी चाहिए। ताकि मनुष्य की चेतना आनन्दित हो प्रसन्न होकर इस संसार से विदा हो। तभी कबीर दास जी कहते है कि ऐसी करनी कर चलो, हम हंसे जग रोए।

दुखमय है संसार

संसार तो दुख मय है ही। यहां कोई भी प्रसन्न हो ही नहीं सकता । जो भी कहते है हम खुश है प्रसन्न है मजा आ रहा है आनन्द आ रहा है वे सब अज्ञानी है। यदि किसी से पूछो कि तुम्हारी मृत्यु हर पल हो रही है या नही। ज्ञानी कहेगा कि हम हर क्षण जीते है और उसी क्षण मरते भी है । जीना मरना साथ चलता है पर दिखाई नहीं देता है। जो जीने और मरने को हर पल देखता है वह ही ध्यानी है चैतन्य है। जब सुख और दुख साथ ही चल रहे है दुख पीछा ही नहीं छोडता है तो हम कैसै प्रसन्न रहते है यह विचारणीय है। और एक दिन हम अंततः मर जाते हैं तो हमारे शरीर को जानने वाले व शरीर से प्रेम करने वाले रोते ही है। जग रोता ही है। जो ज्ञानी होता है वह अपने शरीर का जीना और मरना रोज देखता है वह शरीर से हटकर आत्मा पर चला जाता है साक्षी हो जाता है । आनन्द यहां ही मिलता है क्योकि यहां पर जीना और मरना जैसा कुछ नही होता। इस चैतन्यता की स्थिति मे हम हसतें है कि देखो मेरा शरीर तो मिट जाएगा पर मै तो फिर भी हूं। इसलिए जिनकी चेतना उच्च स्तर पर होती है निर्विचार ध्यान करते है उनका शरीर से मोह छूट जाता है। हम भी हर क्षण इसी ध्यान में रहते हैं कि शरीर कभी भी छूट सकता है अतः शीघ्र से शीघ्र अपने मूल स्वरूप से एक हो जाए। चैतन्यता या होश मे आना ही ध्यानी की हंसी और प्रसन्नता का कारण होता है । मन को परमात्मा के अतिरिक्त कहीं भी लगाया तो पछताना पडेगा।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments