झारखंड के दुमका जिले में स्थित बासुकीनाथ मंदिर न केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि यह लाखों शिव भक्तों की आस्था का अटूट केंद्र भी है. देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर से लगभग 42 किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर का इतिहास और महत्व अनूठा है. आइए जानते हैं
बासुकीनाथ मंदिर का इतिहास
बासुकीनाथ मंदिर के इतिहास को लेकर दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं. पहली कथा के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण ‘बासु’ नामक एक व्यक्ति ने किया था, जो एक साधारण ग्रामीण था. कहा जाता है कि जमीन की खुदाई के दौरान बासु को एक शिवलिंग मिला था, जिसकी स्थापना वहां की गई। इसी कारण इस स्थान का नाम ‘बासुकीनाथ’ पड़ा.
दूसरी और अधिक प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब मंदराचल पर्वत को मथनी और नागराज ‘वासुकी’ को रस्सी (नेति) बनाया गया था. मंथन के दौरान नागराज वासुकी को जो पीड़ा हुई, उससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने इसी स्थान पर भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। महादेव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए और नागराज के नाम पर ही यहां ‘बासुकीनाथ’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए.
बैद्यनाथ धाम के साथ संबंध
बासुकीनाथ की महिमा बाबा बैद्यनाथ (देवघर) के साथ अटूट रूप से जुड़ी हुई है. शिव भक्तों के बीच एक कहावत प्रसिद्ध है— “देवघर का कचहरी, बासुकीनाथ का दीवानी.” इसका अर्थ है कि श्रद्धालु देवघर में अपनी अर्जी लगाते हैं और बासुकीनाथ आकर उनकी सुनवाई पूरी होती है. माना जाता है कि जब तक कोई भक्त देवघर में जल चढ़ाने के बाद बासुकीनाथ आकर दर्शन नहीं करता, तब तक उसकी यात्रा और पूजा सफल नहीं मानी जाती.
मंदिर की वास्तुकला
बासुकीनाथ का मुख्य मंदिर बहुत भव्य और पारंपरिक स्थापत्य शैली में बना है. मुख्य मंदिर के अलावा यहां कई अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी हैं. सावन के महीने (श्रावण मास) में यहां श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है. सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर आने वाले ‘कांवरिये’ देवघर के बाद नंगे पैर चलकर यहाँ पहुंचते हैं और महादेव का अभिषेक करते हैं.
बासुकीनाथ मंदिर के पास ही एक सरोवर है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसमें स्नान करने से शरीर और मन की अशुद्धियां दूर हो जाती हैं.







