महाभारत की कथा में कई ऐसे पात्र हैं जिनके बिना यह महाकाव्य अधूरा लगता है. उन्हीं में से एक हैं भीष्म पितामह. महायोद्धा, धर्मनिष्ठ और अटूट प्रतिज्ञा के प्रतीक भीष्म पितामह की कहानी हर किसी को आकर्षित करती है. उनके जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक घटनाओं की श्रृंखला ऐसी है जो प्रेरणा भी देती है और भावुक भी करती है. भीष्म पितामह का असली नाम देवव्रत था और वे गंगा और हस्तिनापुर के राजा शांतनु के पुत्र थे. उनकी जीवन यात्रा त्याग, कर्तव्य और तपस्या का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि गंगा के कितने पुत्रों में से भीष्म पितामह कौन से थे? आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य रवि पराशर से उनकी जन्म कथा और प्रतिज्ञा से जुड़ी पूरी कहानी.
गंगा और शांतनु का विवाह
पौराणिक कथाओं के अनुसार हस्तिनापुर के राजा शांतनु गंगा से विवाह करना चाहते थे. गंगा ने उनकी इच्छा स्वीकार तो की लेकिन एक शर्त रखी कि राजा उनके किसी भी कार्य पर सवाल नहीं करेंगे. राजा शांतनु ने यह शर्त मान ली और दोनों का विवाह हुआ. विवाह के बाद जब गंगा ने पहला पुत्र जन्मा तो उसे नदी में प्रवाहित कर दिया. राजा शांतनु यह देखकर दुखी हुए, लेकिन उन्होंने वचन निभाया और कुछ नहीं बोले. इसी तरह गंगा ने अपने सात पुत्रों को नदी में बहा दिया.
जब गंगा ने आठवें पुत्र को जन्म दिया और उसे भी नदी में प्रवाहित करने लगीं तो इस बार राजा शांतनु खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने गंगा को रोक दिया. गंगा इस पर नाराज होकर राजा को छोड़कर चली गईं और अपने आठवें पुत्र को लेकर स्वर्ग लोक चली गईं. वही आठवां पुत्र आगे चलकर देवव्रत के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इतिहास में भीष्म पितामह के रूप में जाना गया. यानी भीष्म पितामह गंगा के आठवें पुत्र थे.
भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा
देवव्रत ने छोटी उम्र से ही शौर्य, नीति और धर्म का पालन करना सीख लिया था. जब राजा शांतनु ने दूसरी बार विवाह करने की इच्छा जताई तो सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि नई रानी के पुत्र को गद्दी कैसे मिलेगी. उसी समय देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य और सिंहासन न लेने की प्रतिज्ञा कर ली. यह प्रतिज्ञा इतनी कठोर और असाधारण थी कि उन्हें उसी दिन से भीष्म कहा जाने लगा.
भीष्म का महत्व
महाभारत की कथा में भीष्म पितामह का स्थान बेहद ऊंचा है. वे न सिर्फ एक महान योद्धा थे बल्कि धर्म और नीति के सबसे बड़े ज्ञाता भी माने जाते हैं. कुरुक्षेत्र के युद्ध में उन्होंने कौरवों की तरफ से सेनापति की भूमिका निभाई, लेकिन जीवन के अंत समय में उन्होंने पांडवों को नीति और धर्म से जुड़े उपदेश दिए. उनकी मृत्युशैया पर दिए गए विचार आज भी लोगों के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं.