पिछड़ी सोच पर भारी कश्मीर की नई आवाज़, सुरों से लिखी आज़ादी की दास्तां

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मुंबई: कहते हैं, एक सच्चे कलाकार की कला हर धर्म, जाति, पंथ और लिंग की सीमाओं से ऊपर उठकर सिर्फ इंसानियत और भावनाओं की जुबान बोलती है। उसकी कला को समाज की बेड़ियां जकड़ नहीं सकतीं। दूसरे शब्दों में कहें तो एक कलाकार को कैद किया जा सकता है लेकिन उसकी कला को नहीं। अभिनेत्री सबा आजाद और सोनी राजदान की फिल्म 'सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइड' इसी सच को बयां करती है।

कश्मीर की एक साधारण सी लड़की जो सपने तो देखती है मगर उन्हें पूरा करने की उसे अनुमति नहीं है। क्यों? क्योंकि वो एक लड़की है, जिसे शादी करके अपने शौहर के घर जाना है। कहने को तो 'आजाद भारत' में साल 1954 की बात है, लेकिन आजादी का असली मतलब क्या है, ये शायद किसी को नहीं पता। ये कहानी है साधारण सी लड़की 'जेबा' की, जो आगे चलकर कश्मीर की 'नूर बेगम' बनती हैं। 

कहानी 
फिल्म की कहानी शुरू होती है मौजूदा वक्त से जहां नूर बेगम रेडियो कश्मीर की सबसे सीनियर गायिका हैं। उन्होंने वर्षों से अपने सुरों से कश्मीरी गीतों को देशभर में पहचान दिला दी है। उनका एक रुतबा है। सभी लोग उनकी काफी इज्जत करते हैं, लेकिन आज भी वो अपने जैसे कई कलाकारों के हक और अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। 'नूर बेगम' रेडियो कश्मीर पर गाने वालीं पहली महिला गायिका बनीं लेकिन ये सफर उन्होंने हजार मुश्किलों को पार करने के बाद तय किया। मुंबई से एक लड़का आया जो म्यूजिक में काफी दिलचस्पी रखता है और सबसे बड़ी बात नूर बेगम का बहुत बड़ा फैन है। वो नूर बेगम की अनसुनी कहानी को सुनना चाहता है। आखिर कैसे कश्मीर की साधारण सी लड़की देशभर में अपनी आवाज से छा गईं। बहुत सोच-विचार करने के बाद नूर बेगम अपनी स्टोरी सुनाने के लिए तैयार हो जाती हैं। 

कहानी है कश्मीर में रहने वाली जेबा की, जो अपनी अम्मी-अब्बू की इकलौती बेटी है। संगीत में जेबा की दिलचस्पी है लेकिन उसे ना तो म्यूजिक सुनने की इजाजत है और ना ही गाने की। जेबा अब्बू के सबसे करीब है क्योंकि एक अब्बू ही हैं जो जेबा की कला और प्रतिभा को पहचानते हैं। अम्मी दिन भर जेबा और अब्बू को ताने मारती रहती हैं। अब्बू पेशे से महिलाओं के दर्जी है जो जेबा की अम्मी को बिल्कुल नहीं पसंद। अम्मी हर किसी मां की ही तरह बेटी को सिलाई-बुनाई और खाना बनाना सिखाना चाहती हैं क्योंकि वो चाहती हैं कि बेटी को शादी के बाद कोई ताने ना सुनने पड़े। जेबा उस पिछड़े समाज में पली-बढ़ी है जहां लोग इसी सोच को लेकर चलते हैं कि औरतें धरती पर सिर्फ शादी करने आती हैं।

जेबा कुछ पैसे कमाने के लिए संगीत सिखाने वाले उस्ताद गुलाम नबी के यहां बर्तन उठाने और घर के छोटे-मोटे काम करने के लिए जाती है। उसी दौरान जब वो उस्ताद को गाते हुए सुनती है तो मानो संगीत उसकी रूह को छू जाता है। एक दिन अचानक जेबा की सहेलियां उसे गाने के लिए कहती हैं और उसी वक्त उस्ताद गुलाम नबी जेबा की आवाज सुन लेते हैं। उस्ताद पहचान जाते हैं कि ये लड़की खास है। वो जेबा को गाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उसका नाम रेडियो कश्मीर के सिंगिंग मुकाबले में भी दर्ज करवा देते हैं। जेबा परेशान है कि वो कैसे अम्मी से छुपकर मुकाबले में हिस्सा लेगी और गाना गाएगी। उस्ताद जेबा के काम करने के घंटे बढ़ा देते हैं ताकि वो काम भी कर ले और गाने का रियाज भी। 

उस्ताद के जबरदस्ती कहने पर जेबा जिस मुकाबले में जाती है, वहां एक भी महिला नहीं है और ना ही इससे पहले किसी महिला ने कभी मुकाबले में हिस्सा लिया। मुकाबले के दौरान जब जेबा का नाम मंच से अनाउंस होता है तो उसके उस्ताद के अलावा एक भी शख्स उसके लिए तालियां नहीं बजाता। जेबा जब मुकाबले में गाना शुरू करती है तो उस्ताद को छोड़कर वहां मौजूद हर एक शख्स उसकी आवाज को सुनकर हैरान रह जाता है। किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि एक लड़की इतना अच्छा गा सकती है।

इसी दौरान जेबा की जिंदगी में एंट्री होती है अजाद साहब की। आजाद साहब को शायरी लिखने का शौक है। उन्हें हमेशा अपने परिवार से आजादी मिली है अपनी जिंदगी में वो सब कुछ हासिल करने की, जो वो करना चाहते हैं। आजाद साहब जेबा को गाते हुए सुनते हैं तो वो उसी में ही खो जाते हैं। जेबा मुकाबला जीत जाती हैं और उन्हें कैश प्राइज के साथ-साथ उसे रेडियो कश्मीर के लिए गाने का मौका भी मिल जाता है।

हालांकि वो सिर्फ एक शर्त पर गाना शुरू करती है और वो ये कि वो कभी अपना असली नाम 'जेबा' नहीं बताएगी। इसी दौरान आजाद साहब उन्हें नया नाम देते हैं- नूर बेगम..जिनकी आवाज रूह को छू जाए। हालांकि समाज से जेबा की लड़ाई कभी रुकती नहीं, वो अब भी अपने हक के लिए हाथ-पैर मार रही है। उसके जूनियर्स को उससे ज्यादा पैसे मिल रहे है ये देखकर वो सीधा रेडियो कश्मीर के प्रमुख के पास पहुंच जाती है और कहती है कि उसे जब तक बराबर के पैसे नहीं मिलेंगे उसे गाने का प्रोत्साहन नहीं मिलेगा।

जेबा के अब्बू और उस्ताद के बाद एक आजाद साहब ही हैं जो जेबा को समाज के सारे बंधनों को तोड़ आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। जेबा अपना नाम रेडियो कश्मीर में दर्ज कराते हैं लेकिन वो उन्हें डरी-सहमी हुई जेबा से कब प्यार हो जाता है पता ही नहीं चलता। फिर अचानक जेबा की जिंदगी में तूफान आ जाता है जब एक इवेंट के बाद उसकी फोटो आजाद साहब के साथ अखबार में छप जाती है। फिर क्या हुआ जब ये बात उसके घर में पता चली? क्या जेबा ने हमेशा के लिए गाना छोड़ दिया? क्या वो आजाद साहब से दूर हो गई। यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।

अभिनय 
फिल्म में सबा आजाद ने जेबा का किरदार निभाया है जिनकी मासूमियत स्क्रीन पर देखते ही बनती है। सबा ने अपने किरदार के साथ जस्टिस करने की पूरी कोशिश की है और इसके लिए उन्हें पूरे नंबर दिए जाने चाहिए। वहीं मौजूदा वक्त में जेबा यानी नूर बेगम का किरदार दिग्गज अभिनेत्री सोनी राजदान ने निभाया है। सोनी राजदान ने अपने अभिनय का पूरा अनुभव फिल्म में झोंक दिया है। सबसे बड़ी चुनौती जो इन अभिनेत्रियों के सामने थी वो था कश्मीरी एक्सेंट को अपनाने की, जिसके लिए इनकी तारीफ जरूर करनी चाहिए। जेबा की अम्मी के रोल में शिबा चड्ढा नजर आ रही हैं, वहीं आजाद साहब का रोल जैन खान दुर्रानी ने निभाया है। एक्टिंग के मामले में फिल्म में कहीं पर भी कोई खामी नजर नहीं आती। हर एक किरदार अपने-अपने प्लॉट के हिसाब पूरी तरह खरा उतरता है। फिल्म में तारुक रैना और लिलेट दुबे भी नजर आ रहे हैं।

निर्देशन
फिल्म के निर्देशन की कमान संभाली है दानिश रेनजू ने, जिन्होंने कहानी को दो अलग-अलग समयों में दिखाया है। जेबा से नूर बेगम बनने की कहानी को दानिश ने खूबसूरत तरीके से दिखाने की कोशिश की है। हालांकि फिल्म के जो इमोशन्स उभर कर सामने आने चाहिए थे वो शायद नहीं हो पाया है। मुद्दा बेहद संवेदनशील था लेकिन भावनाओं को उस तरीके से उतारा नहीं गया है जिसकी शायद मुझे उम्मीद थी। फिल्म देखने के बाद एक-आधी जगह को छोड़कर कहीं पर भी वो जज्बात खुलकर सामने नहीं आते, जिन्हें देखकर आंखें नम हो जाएं। एक कश्मीरी मूल के भारतीय फिल्ममेकर, डायरेक्टर और राइटर होने के नाते दानिश शायद थोड़ा बेहतर तरीके से दिखा सकते थे। 

कमजोरी
कमजोर कड़ियों की बात करें तो फिल्म के जज्बातों के साथ वो कनेक्ट मिसिंग लगता है। अगर आप कश्मीर के किसी संवेदनशील मुद्दे को पर्दे पर देखते हैं तो उम्मीद होती है कि आप पूरी तरह से फिल्म के इमोशन्स में डूब जाएंगे लेकिन अफसोस वैसा नहीं हो पाता। कहानी बहुत जल्दी जल्दी आगे बढ़ती रहती है और भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। इसके अलावा हर 2-3 मिनट में कोई ना कोई कश्मीरी गाना भी फिल्म में सुनने को मिल जाता है जो कि फिल्म की पहचान है लेकिन बार-बार एक ही गाना सुनने से कहीं ना कहीं थोड़ी बोरियत आ सकती है।

फिल्म के बारे में
फिल्म कश्मीर की लोकप्रिय पद्मश्री पुरस्कार विजेता राज बेगम के सफर पर आधारित एक सच्ची कहानी है। कश्मीर की पहली महिला गायिका राज बेगम जिन्होंने घाटी से आने वालीं दूसरी महिला संगीत कलाकारों के लिए भी राह बनाई। उनकी कला को पहले तो लोगों ने पहचाना नहीं, फिर मान्यता देने में भी देरी की, उसके बाद किसी ने उनके संगीत को संजोने की भी कोशिश नहीं की। हालांकि उनके गीत ना ही सिर्फ कश्मीरियों के बल्कि पूरे भारतवर्ष के दिलों में हमेशा के लिए अमर हो गए। राज बेगम के गानों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड तो नहीं है लेकिन अनुमान है कि उन्होंने अपने करियर में करीब 2000 गाने गाए। 

फिल्म देखें या फिर नहीं?
अगर आप इमोशन, ड्रामा और संवेदनशील कहानियों के फैन हैं तो आपको ये फिल्म एक बार जरूर देखनी चाहिए। समाज की उस हकीकत के बारे में दिखाया गया है जिसका सामना आज भी बहुत सारी जगहों पर कई लड़कियों को करना पड़ता है। इस फिल्म को अमेजन प्राइम पर रिलीज किया गया है।