Friday, June 21, 2024
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Ramlala के अधिवक्ता 92 वर्ष की आयु में भी कई घंटे खड़े रहकर करते थे बहस, न्यायालय में बहस के दौरान परासरण जूते नहीं पहने

Ayodhya: देश के सर्वोच्च न्यायालय में राम जन्मभूमि के लिए लड़ी गई कानूनी लड़ाई में Ramlala के अधिवक्ता के रूप में के परासरण का नाम अग्रणी है। 92 वर्ष की आयु में सर्वोच्च न्यायालय में घंटों खड़े रहकर बहस करके तमाम वामपंथी इतिहासकारों के झूठे तथ्यों को तर्कों और सुबूतों की कसौटी पर खारिज करने का काम उन्होंने बखूबी किया। भगवान राम में असीम आस्था के कारण वे कोर्ट में बहस के दौरान जूता नहीं पहनते थे। इतना ही नहीं बहस के पहले वह भगवान श्री राम का स्मरण कर हाथ जोड़कर प्रणाम करते थे और उनकी अनुमति लेकर ही बहस करते थे। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि वे अपनी अंतिम सांस के पहले अपने मुवक्किल रामलला विराजमान के लिए न्याय चाहते हैं।

सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर

रामजन्मभूमि मामले की अंतिम बहस के 40 कठिन दिनों के दौरान के परासरण के बारे में सबसे आकर्षक बात थी 92 वर्ष की आयु में उनके मन और शरीर की सकारात्मक ऊर्जा। न्यायालय में अंतिम 40 दिनों की गहन व तीक्ष्ण बहस के दौरान, परासरण मुस्लिम पक्ष के तेजतर्रार अधिवक्ता राजीव धवन का सामना करने के लिए हर दिन सुबह 10.30 बजे शुरू होने वाले और शाम 4 या 5 बजे के आसपास पूरा होने वाले सत्र के लिए अच्छी तरह से तैयार होकर आते थे। यहां तक ​​कि जब राजीव धवन ने भगवान राम के जन्मस्थान का नक्शा हिंदू पक्ष के किसी व्यक्ति की मूर्खता बताते हुए फाड़ दिया था, तब भी परासरण शांत, संयमित रहे। परासरण मानते थे कि “यह राम के साथ उनका आध्यात्मिक रिश्ता था जिसने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की। वे मानते थे कि रामलला के हितों के लिए बहस करना भी एक प्रकार से पूजा ही है। परासरण अपने तर्कों में प्राचीन हिंदू ग्रंथों का इतना उल्लेख करते हैं कि मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कौल उन्हें ‘इंडियन बार का पितामह’ की उपाधि तक दे चुके हैं।

देवताओं के वकील

9 अक्टूबर 1927 में तमिलानाडु के श्रीरंगम में जन्में परासरण के पिता केशव आयंगर भी प्रसिद्ध वकील के साथ ही वैदिक विद्वान थे। परासरण बचपन से ही प्राचीन भारतीय ग्रंथों का काफी अध्ययन किया और अक्सर कोर्ट में अपने तर्कों के बीच उनमें से कुछ ना कुछ उदधृत करते रहे हैं। 89 वर्ष की आयु में 2016 से उन्होंने केस लेना बंद कर दिया था। तब से अब तक उन्होंने केवल 2 ही केस लिए हैं। एक था राम जन्मभूमि का केस और दूसरा सबरीमाला मंदिर का। अयप्पा और रामलला की ओर से मुकदमा लड़ने के कारण उन्हें देवताओं का वकील भी कहा जाता है। सबरीमाला मंदिर का केस अयप्पा भगवान के मंदिर में रजस्वला स्त्रियों के प्रवेश से जुड़ा था और राम मंदिर बाबरी विवाद तो देश की धड़कनों से ही जुड़ा था। उन्होंने इस केस में रामायण से ‘नैस्तिका ब्रह्मचर्य’ की अवधारणा भी समझाई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने उनके सभी तर्कों को सबरीमाला केस में खारिज कर दिया, लेकिन राम मंदिर केस में 5 जजों की बेंच में से कोई भी जज उनके तर्कों के खिलाफ नहीं गया और करोड़ों रामभक्तों का उन्होंने दिल जीत लिया।

शीर्ष पदों पर भी रहे

परासरण ने 1958 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी प्रैक्टिस शुरू की। आपातकाल के दौरान, वह तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल थे और 1980 में भारत के सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किए गए थे। उन्होंने 1983 से 1989 तक भारत के अटॉर्नी जनरल के रूप में कार्य किया।

पद्म भूषण व पद्म विभूषण से सम्मानित

1999-2004 के एनडीए कार्यकाल के दौरान, पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिए मसौदा तैयार करने और संसदीय समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया। तत्कालीन सरकार ने उन्हें 2003 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया था। यूपीए-1 सरकार ने उन्हें 2011 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया और जून, 2012 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित भी किया था।

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