विमान हादसे से पहले भावुक थे अजित बोले- मैं अब थक चुका हूं, मुझे अब कुछ नहीं चाहिए

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मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति के दादा कहे जाने वाले उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बारामती में एक दर्दनाक विमान हादसे में निधन हो गया है। यह न केवल उनकी पार्टी एनसीपी के लिए एक अपूरणीय क्षति है, बल्कि राज्य की राजनीति के एक युग का अंत भी है। पिछले कुछ वर्षों में विवादों, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और चुनावी चुनौतियों का सामना करने वाले अजित पवार अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले अंदरूनी तौर पर काफी व्यथित और थके हुए महसूस कर रहे थे। उनके सबसे करीबी मित्र और बारामती विद्या प्रतिष्ठान के ट्रस्टी किरण गूजर ने उनके अंतिम दिनों की उन भावुक यादों को साझा किया है, जो एक कठोर नेता के भीतर छिपे संवेदनशील इंसान को उजागर करती हैं।
किरण गूजर, जिन्होंने 1984 में अजित पवार को राजनीति के पहले चुनाव के लिए मनाया था, बताते हैं कि पिछले कुछ समय से अजित पवार का राजनीति से मोहभंग होने लगा था। कुछ दिन पहले ही उन्होंने गूजर से अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा था, अब मुझे यह सब नहीं चाहिए, मैं थक चुका हूँ। गूजर के अनुसार, अजित पवार अपनी कड़ी मेहनत के बावजूद मिलने वाली आलोचनाओं और राजनीतिक झटकों से आहत थे। उन्होंने बेहद भावुक होकर अपने मित्र से पूछा था, मैं दिन-रात इतनी मेहनत कर रहा हूँ, फिर भी मुझे यह सब (विरोध और आलोचना) क्यों सहना पड़ रहा है? लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद तो वे इतने टूट गए थे कि विधानसभा चुनाव लड़ने के पक्ष में भी नहीं थे, लेकिन करीबी साथियों के समझाने पर वे दोबारा सक्रिय हुए थे।
अजित पवार के व्यक्तित्व में आए बदलावों पर चर्चा करते हुए किरण गूजर बताते हैं कि शुरुआती दिनों में वे अध्यात्म और मंदिर जाने के सख्त खिलाफ थे। बचपन में पिता को खोने और परिवार की विषम परिस्थितियों के कारण उनके मन में ईश्वर की अवधारणा को लेकर एक अलग सोच थी। वे अक्सर कहते थे कि भगवान ने उनके साथ अच्छा नहीं किया, इसलिए वे वहां क्यों जाएं? हालांकि, उम्र और अनुभव के साथ उनके व्यवहार में नरमी आई थी। वे भगवान पर भरोसा तो करने लगे थे, लेकिन कभी अंधविश्वासी नहीं रहे और न ही उन्होंने कभी धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया।
अपनी आखिरी मुलाकात को याद करते हुए गूजर भावुक हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि मौत से महज पांच दिन पहले अजित पवार ने उनसे कहा था कि वे ऊब रहे हैं और उन्हें कहीं बाहर जाना चाहिए। दोनों ने साथ में आधा दिन बिताया और रात का खाना खाया। वह अजित पवार के साथ उनका आखिरी भोजन था। उस समय भी अजित पवार ने अपनी थकान और राजनीति से दूर रहने की इच्छा जाहिर की थी, जिसे सुनकर उनके मित्र भी हैरान थे कि आखिर दादा के मन में क्या चल रहा है। हादसे वाले दिन की दास्तां बयां करते हुए किरण गूजर ने बताया कि विमान में सवार होने से ठीक पहले अजित पवार ने उन्हें फोन किया था। वे उन्हें लेने खुद हवाई अड्डे पहुंचे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनकी आंखों के सामने ही वह विमान क्रैश हो गया। गूजर ने बताया कि मलबे से जब अजित पवार का पार्थिव शरीर निकाला गया और उसे कार में रखा गया, तो उन्होंने ही अपने प्रिय दादा की पहचान की। वे कहते हैं कि यह सब एक बुरे सपने जैसा लगता है, जिस पर विश्वास करना नामुमकिन है कि बारामती के लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाला नेता अब हमारे बीच नहीं रहा। 1984 में छत्रपति कारखाना चुनाव से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर, 2026 की इस दुखद दोपहर में हमेशा के लिए थम गया।