विपक्ष ने कसा तंज: ऊर्जा संकट और गैस की कमी पर सरकार को घेरने की तैयारी

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नई दिल्ली। संसद में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाया गया विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव भले ही गिर गया हो, लेकिन विपक्षी दलों ने अब सरकार को घेरने के लिए एक नई और आक्रामक रणनीति तैयार कर ली है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध से उपजे ईंधन संकट और देश में रसोई गैस (एलपीजी) की भारी किल्लत को लेकर सरकार पर हमलावर होने जा रहे हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे भीषण संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर अब भारतीय रसोई और आम आदमी की जेब पर दिखने लगा है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक में स्पष्ट किया कि अब पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की विदेश नीति तथा ऊर्जा सुरक्षा की विफलता को प्रमुखता से उठाएगी। राहुल गांधी का तर्क है कि यह संकट सीधे तौर पर आम जनता से जुड़ा है, क्योंकि युद्ध के कारण न केवल रसोई गैस की कमी हुई है, बल्कि ईंधन संकट के चलते महंगाई और हवाई किराए में भी अप्रत्याशित उछाल आया है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह अमेरिका के दबाव में झुक रही है और अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने में नाकाम रही है। गौरतलब है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है और वहां जारी युद्ध ने कमर्शियल एलपीजी की सप्लाई को बाधित कर दिया है।
संसद के भीतर इस मुद्दे पर घमासान पहले ही शुरू हो चुका है। सोमवार और मंगलवार को विपक्ष ने एलपीजी संकट को लेकर सदन में भारी हंगामा किया, जिसके चलते कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा। विपक्षी सांसदों ने सदन में स्लोगन लिखे थे। कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा ने मांग की है कि सरकार को अन्य सभी मुद्दों को छोड़कर सबसे पहले रसोई गैस की कीमतें कम करने और आपूर्ति सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर से घटकर 90 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई हैं, तो सरकार के भीतर इतनी घबराहट क्यों है? वहीं, सीपीआई(एम) नेता जॉन ब्रिट्टास ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार पर्याप्त स्टॉक होने का झूठा दावा कर रही है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को युद्ध रोकने के लिए प्रभावी कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए थे, लेकिन वह केवल मूकदर्शक बनी हुई है। अब देखना यह होगा कि सरकार संसद में विपक्ष के इन तीखे सवालों का क्या जवाब देती है।