T20 WC: आईसीसी के सामने घुटने टेके, पर मंच से गीदड़भभकी जारी! नकवी ने आसिम मुनीर का नाम लेकर दिखाई झूठी अकड़

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भारत के खिलाफ टी20 विश्व कप मैच पर लंबे ड्रामे के बाद जब अंततः खेलने की सहमति बन गई, उसी समय पीसीबी अध्यक्ष और पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी ने ऐसा बयान दे दिया जिसने नई बहस छेड़ दी। समझौते के कुछ घंटों पहले उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान पर किसी का दबाव नहीं है।उन्होंने कहा, 'न मैं भारत और आईसीसी की धमकियों से डरता हूं, न पाकिस्तान की सरकार डरती है, और जहां तक फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर का सवाल है, आप उन्हें जानते ही हैं, वह कभी नहीं डरते।' नकवी का यह बयान अब मजाक का विषय बन गया है। लोगों का कहना है कि जब अंत में मैदान में उतरना ही पड़ा, तब इस तरह की भाषा पाकिस्तान की स्थिति को मजबूत नहीं बल्कि विरोधाभासी बनाती है।

ताकत का संदेश या सियासी मंच?

आसिम मुनीर का नाम पाकिस्तान में पिछले कुछ समय से शक्ति और सैन्य प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाए जाने को वहां बड़े राजनीतिक संदेश की तरह प्रचारित किया गया, लेकिन खेल के विवाद में सेना के शीर्ष पद का उल्लेख करना कई विशेषज्ञों को असहज करने वाला कदम लगा। उनके मुताबिक, इससे यह संकेत गया कि क्रिकेट से ज्यादा यह घरेलू राजनीतिक दर्शकों को संदेश देने की कोशिश थी। पाकिस्तान आतंकियों को पनाह देने के लिए जाना जाता है। अपने देश में मुनीर से आतंकवादी खत्म नहीं किए जा रहे और नकवी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। इस्लामाबाद में हाल ही में विस्फोट में कई लोग मारे गए थे। मुनीर और नकवी (जो कि पाकिस्तान के गृह मंत्री भी हैं) अपने लोगों की हिफाजत कर नहीं पा रहे और दुनिया भर की बातें करने चले हैं। 

पहले सख्ती, फिर यू-टर्न

हफ्तों तक बहिष्कार, शर्तें और बयानबाजी चलती रही। मगर आखिरकार बातचीत, राजनयिक संपर्क और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान को तय कार्यक्रम मानना पड़ा। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अगुआई में चर्चा के बाद टीम को 15 फरवरी को खेलने की अनुमति दी गई। सरकार ने इसे बहुपक्षीय संवाद का नतीजा बताया और कहा कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की भावना को बनाए रखना जरूरी था, लेकिन सवाल यही उठा- अगर खेलना ही था, तो फिर इतनी तीखी बयानबाजी किसके लिए? इतना ड्रामा किसके लिए?
 
आईसीसी ने क्या कहा

आईसीसी ने अपने स्तर पर हुई बैठकों को सकारात्मक बताया। माहौल को रचनात्मक कहा गया और किसी सजा की बात नहीं की गई। यानी अंत में मामला बातचीत से सुलझा, न कि दहाड़ से। साफ हो गया कि गीदड़भभकियों से न तो समाधान निकलता है और न ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई प्रभावित होता है, उल्टा मजाक जरूर बनता है, आपका भी और आपके देश का भी। जिस बांग्लादेश के मुद्दे पर पाकिस्तान ने सख्ती का रुख दिखाने की कोशिश की, वही आखिरकार मैच खेलने के पक्ष में नजर आया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी ऊंची आवाज किसके लिए थी।