पटना,। मनरेगा योजना का नाम बदलने पर राजद प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सरकार से जानना चाहा है कि यूपीए सरकार के समय शुरू किए गए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रान्तिकारी बदलाव लाने वाली इस महत्वाकांक्षी योजना के नाम से महात्मा गांधी हटाकर पूज्य बापू जोड़ने के पीछे कौन सी मानसिकता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी तो केवल एक हीं है उसमें लेशमात्र भी संशय और भ्रम नहीं है। पर बापू के नाम से संबोधित किए जाने वाले अनेकों हैं। एक तो बलात्कार के आरोप में सजा काट रहे तथाकथित संत को भी भाजपा नेताओं सहित अन्य लोग भी बापू कहकर सम्बोधित करते हैं।
राजद प्रवक्ता ने कहा कि वर्तमान केन्द्र सरकार को अपना न तो कोई विजन है और न कोई मिशन। उसका एकमात्र विजन यूपीए सरकार के समय शुरू की गई लाभकारी योजनाओं का नाम बदलकर झूठी वाहवाही लूटना है। पिछले ग्यारह वर्षों में केन्द्र की एनडीए सरकार द्वारा एक भी नई योजना की शुरुआत नहीं की गई है। उसके द्वारा अबतक यूपीए सरकार के समय शुरू की गई कुल 32 योजनाओं का केवल नाम बदल कर एनडीए सरकार की उपलब्धि बताई जा रही है।
श्री गगन ने कहा कि जो लोग इसी मनरेगा को यूपीए सरकार के विफलता का जीता-जागता स्मारक बता रहे थे आज वे ही इसे अलम्बरदार बता रहे हैं। यूपीए सरकार में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के सुझाव और यूपीए चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी और तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. डॉ.मनमोहन सिंह जी की सहमति से तत्कालीन केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री और राजद के वरिष्ठ नेता स्व.डॉ.रघुवंश प्रसाद सिंह जी द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से शुरू किए गए इस योजना का नाम बदलने का नहीं बल्कि इसमें आवश्यकतानुसार सुधार करने की आवश्यकता थी। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मनरेगा को कृषि कार्य से जोड़ने की मांग करते रहे हैं। इससे किसानों को सरकारी खर्चे से मजदूर उपलब्ध होगा और मनरेगा मजदूरों को भी काम मिलता रहेगा। जिन उद्देश्यों को लेकर यह योजना लागू की गई थी एनडीए सरकार ने इसे कमजोर हीं किया है। काम करने के बाद भी एक-एक साल तक मजदूरों की मजदूरी नहीं मिल पाता है। बड़े पैमाने पर फर्जी भूगतान किया जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य मांग आधारित है पर एनडीए सरकार द्वारा छ: महिने तक अधिकतम 60 प्रतिशत ही आवंटन का प्रावधान कर दिया गया है। यूपीए सरकार के समय जो मजदूरी दर तय कर दी गई थी, एनडीए सरकार द्वारा आजतक उसमें एक पैसा भी बढ़ोतरी नहीं की गई है। केन्द्र की एनडीए सरकार द्वारा काम के न्यूनतम 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने की बात की जा रही है। पर संवैधानिक प्रावधानों को नजरंदाज करते हुए जब न्यूनतम 100 दिन भी काम नहीं दिया जा रहा है और काम करने के बाद एक-एक साल तक मजदूरी बकाया रखा जा रहा है तो फिर काम के न्यूनतम दिन बढ़ाने की घोषणा आंख में धूल झोंकने के समान है।









