राजनीतिक विस्तार की रणनीति: बंगाल और बिहार के बाद पंजाब पर नजर

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चंडीगढ़। पंजाब में अगले वर्ष (2027) होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राज्य का सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है। दिल्ली के चुनावी झटके के बाद सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) जहाँ अपना आक्रामक चुनावी अभियान पहले ही शुरू कर चुकी है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी सूबे के लिए अपनी एक बेहद चौंकाने वाली और आक्रामक रणनीति का खाका तैयार कर लिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बयानों से यह साफ हो गया है कि भाजपा इस बार पंजाब में किसी भी क्षेत्रीय दल की 'छोटा भाई' बनकर नहीं रहेगी, बल्कि सभी 117 सीटों पर अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। इस ऐतिहासिक फैसले ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ दोबारा गठबंधन की चल रही सभी अटकलों पर पूरी तरह विराम लगा दिया है।

बिहार और बंगाल फॉर्मूले पर पंजाब फतह की तैयारी

शिरोमणि अकाली दल से नाता टूटने के बाद भाजपा पहली बार पंजाब में किंगमेकर बनने के बजाय खुद 'किंग' बनने की राह पर चल पड़ी है। पार्टी इसके लिए अपने 'बिहार और बंगाल मॉडल' को अपनाने जा रही है:

  • बिहार मॉडल: बिहार में भाजपा कभी अपने दम पर मुख्यमंत्री नहीं बना पाई थी, लेकिन हालिया समीकरणों के बाद सम्राट चौधरी को कमान सौंपी गई।

  • बंगाल मॉडल: ठीक इसी तरह, पश्चिम बंगाल में लंबे समय के संघर्ष के बाद आखिरकार विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन को उखाड़ फेंकते हुए भाजपा ने प्रचंड जीत दर्ज की और शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री बनाया।

अब इसी आक्रामक रणनीति के तहत केंद्रीय आलाकमान ने पंजाब का पूरा ब्लूप्रिंट तैयार किया है, ताकि दशकों से शहरी हिंदू वोटों तक सीमित रही भाजपा ग्रामीण सिख बहुल क्षेत्रों में भी सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल कर सके।

सुनील जाखड़ की जगह केवल सिंह ढिल्लों को कमान, 'जाट सिख' कार्ड

आगामी चुनावों और पंजाब के बेहद संवेदनशील जातीय समीकरणों को साधने के लिए भाजपा ने संगठन में बहुत बड़ा फेरबदल किया है। सुनील जाखड़ की जगह पूर्व विधायक केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का पहला प्रमुख 'जाट सिख' अध्यक्ष बनाना इस बात का सीधा संकेत है कि भाजपा कृषि कानूनों के आंदोलन के बाद छिटके हुए ग्रामीण सिख किसानों और जाट समुदाय को दोबारा अपने पाले में लाना चाहती है। पार्टी इसके जरिए 'शहरी हिंदू + ग्रामीण सिख' का एक नया और मजबूत सामाजिक समीकरण तैयार कर रही है।

रवनीत सिंह बिट्टू की नई भूमिका और ड्रग्स का मुद्दा

हालिया राज्यसभा चुनाव में मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को प्रत्याशी न बनाए जाने के पीछे भी पार्टी की एक सोची-समझी चुनावी रणनीति है। हालांकि इसके चलते उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटने के कयास हैं, लेकिन पार्टी आलाकमान बिट्टू का पूरा ध्यान और ऊर्जा पंजाब के जमीनी विधानसभा चुनाव में झोंकना चाहता है। रवनीत सिंह बिट्टू और नवनियुक्त अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों की जुगलबंदी के जरिए भाजपा सिख समाज में अपनी पैठ मजबूत करेगी।

इसके अलावा, भाजपा इस बार आम आदमी पार्टी के खिलाफ 'ड्रग्स' (नशे की समस्या) और चरमराती कानून-व्यवस्था को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने जा रही है, जिसके दम पर कभी 'आप' ने सत्ता पाई थी।

त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस की नई चुनावी समिति

भाजपा और आम आदमी पार्टी की इस सीधी जंग के बीच कांग्रेस ने भी पंजाब में वापसी के लिए अपनी कमर कस ली है। पंजाब में इस बार मुकाबला पूरी तरह त्रिकोणीय (त्रिकोणीय संघर्ष) होने जा रहा है। कांग्रेस आलाकमान ने चुनाव की कमान संभालने और गुटबाजी को रोकने के लिए एक विशेष उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसमें वरिष्ठ नेता अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजनलाल जाटव को शामिल किया गया है। साफ है कि पंजाब की सियासी जमीन पर इस बार एक ऐसा चुनावी संग्राम देखने को मिलेगा, जिसकी गूंज देश की राजनीति को प्रभावित करेगी।