वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच 100 से अधिक दिनों तक चले भीषण युद्ध की समाप्ति और 19 जून को जेनेवा में होने वाले ऐतिहासिक शांति समझौते की खबरों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बहुत बड़ी राहत दी है। जैसे ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को व्यापार के लिए दोबारा खोलने और नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का संकेत दिया, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट (क्रैश) दर्ज की गई।
संकट के चरम दौर में 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका ब्रेंट क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) लुढ़क कर तीन महीने के सबसे निचले स्तर यानी 82 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गया है। इसके साथ ही यूरोपीय बाजार में थोक गैस की कीमतों में भी 6% तक की कमी आई है। हालांकि, इस भारी गिरावट के बावजूद ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि आम उपभोक्ताओं की जेब (पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों) तक इसका सीधा फायदा पहुंचने में अभी कई महीनों का समय लग सकता है।
राहत मिलने में देरी क्यों? क्या हैं तकनीकी पेच?
ग्लोबल एनर्जी एक्सपर्ट्स और 'गोल्डमैन सैक्स' जैसी वित्तीय संस्थाओं के विश्लेषकों का कहना है कि भले ही कागजों पर शांति बहाल हो रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर तेल की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को पूरी तरह सामान्य होने में 6 से 12 महीने का समय लग सकता है। इसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:
शिपिंग इंश्योरेंस और माइंस की सफाई: युद्ध के दौरान फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगों (Mines) को हटाने में समय लगेगा। जब तक शिपिंग कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय बीमा एजेंसियों को यह भरोसा नहीं हो जाता कि यह जलमार्ग 100% सुरक्षित है, तब तक बड़े तेल टैंकरों का परिचालन सामान्य गति से शुरू नहीं हो पाएगा।
रणनीतिक भंडारों (Stockpiles) को दोबारा भरना: युद्ध के कारण दुनिया भर के देशों के आपातकालीन तेल भंडार पूरी तरह खाली हो चुके हैं। बाजार में तेल आते ही सबसे पहले इन खाली भंडारों को भरने की होड़ मचेगी, जिसके कारण कच्चे तेल की कीमतें फिलहाल 80 से 90 डॉलर प्रति बैरल के बीच ही टिकी रह सकती हैं।
बंद कुओं को दोबारा शुरू करना: तेल उत्पादक देशों ने संघर्ष के दौरान जिन कुओं और रिफाइनरियों का उत्पादन बंद या धीमा कर दिया था, उन्हें दोबारा चालू करना एक जटिल तकनीकी प्रक्रिया है। अमेरिकी पेट्रोलियम विश्लेषकों के अनुसार, ईंधन की कीमतें पूरी तरह से युद्ध-पूर्व (Pre-war) स्तर पर 2027 के मध्य तक ही लौट पाएंगी।
भारत की स्थिति मजबूत: पर्याप्त भंडार और सामान्य रिफाइनिंग
वैश्विक स्तर पर मचे इस हाहाकार के बीच भारत के लिए राहत की बात यह है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह नियंत्रण में है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक उच्च स्तरीय समीक्षा के बाद स्पष्ट किया है:
मंत्रालय का आधिकारिक रुख: भारत के पास पेट्रोल, डीजल, एलपीजी (रसोई गैस) और पीएनजी का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। देश की सभी प्रमुख रिफाइनरियां (सरकारी और निजी) अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं। चूंकि भारत ने संकट के दौरान अन्य वैकल्पिक मार्गों और स्रोतों से कच्चे तेल का आयात जारी रखा था, इसलिए देश में ईंधन की किल्लत जैसी कोई स्थिति नहीं है।
सरकार ने घरेलू और औद्योगिक उपभोक्ताओं से अपील की है कि वे ऊर्जा का जिम्मेदारी से उपयोग करें। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम स्थिर होते ही भारतीय तेल कंपनियां भी खुदरा कीमतों की समीक्षा कर आम जनता को बड़ी राहत दे सकती हैं।









