हॉकी विश्व कप में भारत के चार ऐसे दिग्गज, जिन्होंने पदकों की हैट्रिक लगाकर रचा इतिहास

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नई दिल्ली| आगामी 15 अगस्त से हॉकी विश्व कप का रोमांच शुरू होने जा रहा है। इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में इस बार भारतीय पुरुष हॉकी टीम का मुख्य लक्ष्य 70 के दशक के अपने स्वर्णिम दौर और दबदबे को एक बार फिर से वापस हासिल करना होगा। आपको बता दें कि भारतीय टीम ने साल 1971 के विश्व कप में कांस्य पदक, 1973 में रजत पदक और 1975 में ऐतिहासिक स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। भारतीय हॉकी के गौरवशाली इतिहास में चार ऐसे दिग्गज खिलाड़ी हुए हैं, जिन्हें तीन अलग-अलग विश्व कप में पदक जीतने का दुर्लभ गौरव प्राप्त हुआ है। आइए जानते हैं इन महान खिलाड़ियों के बारे में:

1. अशोक कुमार

महान हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद के सुपुत्र अशोक कुमार अपनी जादुई स्टिक वर्क, गेंद पर जबरदस्त नियंत्रण और सटीक गोल स्कोरिंग क्षमता के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते थे। साल 1975 के कुआलालंपुर विश्व कप के फाइनल मुकाबले में पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ विजयी गोल दागकर उन्होंने ही भारत को अब तक का इकलौता विश्व कप खिताब दिलाया था। खेल को अलविदा कहने के बाद उन्होंने विवेक प्रसाद, दिलीप तिर्की और धनराज पिल्लै जैसे कई दिग्गज भारतीय खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया।

2. हरचरण सिंह

1970 के दशक के सबसे तेजतर्रार और बेहद प्रभावशाली खिलाड़ियों में शुमार हरचरण सिंह अपनी अविश्वसनीय रफ्तार के लिए जाने जाते थे। साल 1975 के विश्व कप में मलेशिया के विरुद्ध मैच के दौरान अतिरिक्त समय में किया गया उनका गोल भारत की ऐतिहासिक जीत की बड़ी वजह बना था। उन्होंने 1970 से 1974 के बीच भारतीय टीम के लिए शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीते और खेल से संन्यास लेने के बाद लगातार युवा प्रतिभाओं का मार्गदर्शन करते रहे।

3. माइकल किंडो

एक साधारण आदिवासी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले माइकल किंडो भारतीय हॉकी इतिहास के सबसे भरोसेमंद और चट्टान जैसे मजबूत फुलबैक में गिने जाते थे। उनके आक्रामक टैकल, दबाव में भी शांत रहने की कला और मजबूत डिफेंस की हर कोई मिसाल देता था। उन्हें साल 1972 में देश के प्रतिष्ठित 'अर्जुन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। वे देश के पहले ऐसे आदिवासी खिलाड़ी थे जिन्होंने नौसेना और रेलवे से जुड़कर भारतीय हॉकी में अपनी एक अलग पहचान बनाई। वर्ष 2020 में उनके निधन के पश्चात ओडिशा सरकार ने युवा खेल प्रतिभाओं के प्रोत्साहन के लिए उनके नाम पर एक विशेष योजना की शुरुआत की है।

4. अजित पाल सिंह

विश्व के सर्वश्रेष्ठ और सबसे चतुर मिडफील्डरों में शुमार अजित पाल सिंह अपनी बेहतरीन शारीरिक फिटनेस, खेल की गहरी समझ और शानदार नेतृत्व क्षमता (कप्तानी) के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपनी अद्भुत कप्तानी के दम पर भारत को 1975 के विश्व कप में चैंपियन बनाया था। उनकी अगुआई में ही भारतीय टीम ने फाइनल में पाकिस्तान को धूल चटाकर इतिहास रचा था। साल 2012 के लंदन ओलंपिक के बाद भी वे भारतीय हॉकी के प्रशासनिक कामकाज और मार्गदर्शक के रूप में लगातार सक्रिय रहे हैं।

हॉकी विश्व कप से जुड़े कुछ अहम आंकड़े

  • भारत के नाम कुल पदक: भारतीय खिलाड़ियों ने अब तक हॉकी विश्व कप के इतिहास में कुल 31 पदकवीर दिए हैं, जिन्होंने मिलकर कुल 167 पदक अपने नाम किए हैं। इनमें से सात खिलाड़ी ऐसे हैं जिन्होंने केवल स्वर्ण पदक हासिल किए, जबकि तीन खिलाड़ियों के नाम केवल रजत पदक दर्ज हैं।

  • 1986 के बाद से सूखा: इतिहास गवाह है कि हॉकी विश्व कप का आयोजन पहली बार 1986 में सिंथेटिक टर्फ पर किया गया था, और तब से लेकर आज तक भारतीय टीम विश्व कप में कोई भी पदक जीतने में कामयाब नहीं हो पाई है। भारत के तीनों विश्व कप पदक उससे पहले प्राकृतिक घास (नैचुरल ग्रास) पर खेले गए टूर्नामेंटों के दौरान ही आए थे।