अभिषेक बनर्जी के करीबी सुमित रॉय को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी पर लगाई रोक

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नई दिल्ली| तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक (PA) सुमित रॉय को बहुचर्चित सलबोनी भूमि कब्जा मामले में देश के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) से बहुत बड़ी राहत मिली है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर फिलहाल रोक लगा दी है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुमित रॉय को इस मामले की जांच कर रही एजेंसियों के साथ पूरी तरह से सहयोग करना होगा।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी अग्रिम जमानत

इससे पहले गत 3 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुमित रॉय की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया था। यह पूरा कानूनी विवाद सलबोनी पुलिस द्वारा सरकारी जमीन पर कथित अवैध कब्जे और उससे जुड़े फर्जीवाड़े की जांच से संबंधित है। सुमित रॉय के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात (क्रिमिनल ब्रिच ऑफ ट्रस्ट), दस्तावेजों की जालसाजी, फर्जीवाड़े का इस्तेमाल करने और आपराधिक साजिश रचने जैसी गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान क्या निर्देश दिए?

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ— जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे— ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि सुमित रॉय जांच में पूरी निष्ठा से सहयोग करेंगे। पूछताछ के दौरान उनके साथ कोई भी वकील या अन्य व्यक्ति मौजूद रहने की अनुमति नहीं होगी। उन्हें सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक (भोजन व सामान्य विश्राम के समय को छोड़कर) जांच अधिकारियों के समक्ष उपलब्ध रहना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगली सुनवाई तक उनके खिलाफ कोई भी कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी और उनकी गिरफ्तारी पर रोक बरकरार रहेगी।

सुमित रॉय के वकील की दलीलें

सुमित रॉय की पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि उनके मुवक्किल को बहुचर्चित 'नौकरी के बदले नकद' (कैश फॉर जॉब) मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट से पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी है। उन्होंने अदालत का ध्यान इस ओर भी खींचा कि वर्तमान भूमि कब्जा मामले में एफआईआर उस समय दर्ज की गई जब राज्य में नई राजनीतिक परिस्थितियों के तहत सरकार सत्ता में आई।

पश्चिम बंगाल सरकार ने किया कड़े विरोध का दावा

दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पैरवी कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुमित रॉय को किसी भी प्रकार की राहत दिए जाने का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष दलील दी कि यह कथित आपराधिक कृत्य कई वर्ष पहले हुआ था, लेकिन उस दौरान की व्यवस्था और सरकार ने इसमें कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की थी। उन्होंने अदालत को बताया कि इस संगीन मामले की तह तक जाने और निष्पक्ष जांच के लिए सुमित रॉय से हिरासत में लेकर पूछताछ करना बेहद आवश्यक है। तुषार मेहता ने यह भी दावा किया कि अतीत में जब कानून-प्रवर्तन एजेंसियों ने आरोपी को गिरफ्तार करने का प्रयास किया था, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से इसमें प्रशासनिक बाधाएं उत्पन्न की गई थीं। उन्होंने इस संबंध में एक विस्तृत हलफनामा दायर कर प्रासंगिक सामग्री को अदालत के रिकॉर्ड पर रखने की भी अनुमति मांगी।

फिलहाल क्या है स्थिति?

माननीय उच्चतम न्यायालय के इस अंतरिम आदेश के बाद सुमित रॉय को फिलहाल पुलिसिया कार्रवाई और गिरफ्तारी से सुरक्षा मिल गई है। हालांकि, उन्हें तय शर्तों के मुताबिक जांच एजेंसियों के समक्ष पेश होना होगा और हर संभव सहयोग देना होगा। इस मामले की आगामी सुनवाई के दौरान अदालत जांच की प्रगति और दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों के आधार पर आगे का निर्णय लेगी।