दुनिया के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेलों में शामिल पाम ऑयल की कीमतों में आए तेज उछाल ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़े उत्पादक इंडोनेशिया की बायोडीजल नीति और दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखे मौसम व उत्पादन को लेकर बढ़ती आशंकाओं के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम तेल की कीमतें करीब 20 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। इसका सबसे बड़ा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है।
भारत की आयात पर भारी निर्भरता
भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 58 से 60 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है और यह दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देश है। आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत का खाद्य तेल आयात 10 महीने के उच्च स्तर 14.8 लाख टन पर पहुंच गया, जिसमें अकेले पाम तेल का आयात करीब 7.31 लाख टन रहा। इंडोनेशिया और मलयेशिया भारत के लिए पाम तेल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता हैं।
रसोई से लेकर सौंदर्य प्रसाधनों तक व्यापक इस्तेमाल
पाम तेल केवल रसोई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपयोग बिस्कुट, नमकीन, बेकरी उत्पादों, रेस्तरां उद्योग, साबुन, डिटर्जेंट, शैंपू और कॉस्मेटिक्स में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में इसका उपयोग लंबे शेल्फ-लाइफ और कम लागत के कारण सबसे अधिक होता है, जिसके महंगे होने से कंपनियों पर सीधा दबाव बढ़ रहा है।
महंगाई का चौतरफा असर और बढ़ेंगे दाम
महंगाई के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में पाम तेल की कीमतों में 14.11 प्रतिशत, सूरजमुखी तेल में 18.78 प्रतिशत और सोया तेल में 11.62 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। पाम तेल के महंगा होने से आम उपभोक्ता अन्य विकल्पों की तरफ रुख करेंगे, जिससे सोयाबीन, सरसों और सूरजमुखी तेल के दाम भी बढ़ेंगे। इसके अलावा, ढाबों, रेस्टोरेंट और हलवाइयों के यहां डीप-फ्राइंग के लिए इस्तेमाल होने वाले तेल और वनस्पति घी के महंगे होने से बाहर का खाना भी महंगा हो जाएगा।









