क्रूड में तेजी का डबल झटका, महंगाई बढ़ने के साथ भारत का आयात बिल भी होगा भारी

0
9

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में एक बार फिर गंभीर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं। एक ओर तेल निर्यातक देशों के समूह ओपेक प्लस ने आगामी महीनों के लिए अपनी उत्पादन नीति में कोई बदलाव न करते हुए आपूर्ति बढ़ाने के फैसले को रोक दिया है, वहीं दूसरी तरफ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विश्लेषकों ने आगाह किया है कि पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों में बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच गहराते तनाव के असर से ब्रेंट क्रूड अंतरराष्ट्रीय बाजार में 96.86 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुँच गया, जबकि घरेलू कमोडिटी बाजार में भी इसमें तेजी दर्ज की गई।

ओपेक देशों की बैठक में नीति यथावत रखने का निर्णय

सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, कजाकिस्तान और ओमान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों की उच्चस्तरीय बैठक में तय किया गया कि नए उत्पादन मापदंड निर्धारित होने तक वर्तमान व्यवस्था बनी रहेगी। यद्यपि पूर्व में कटौती की चरणबद्ध वापसी की योजना थी, लेकिन ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के जलमार्ग में आ रही बाधाओं ने भौतिक तेल बाजार की आपूर्ति श्रृंखला को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

क्रूड कीमतों में उछाल और आपूर्ति में गहराता जोखिम

कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड वायदा 97.93 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर तक जा पहुँचा। बाजार विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि व्यापारिक जहाजों पर हमले और तेज होते हैं, तो कीमतें 120 डॉलर तक उछल सकती हैं। हालांकि, यदि निर्यात का प्रवाह सामान्य रहता है, तो कीमतें 80 डॉलर के निचले स्तर पर आ सकती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल की तुलना में यूरोपीय गैस और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति बाधित होने का खतरा अधिक बना हुआ है।

चालू खाता घाटे में बढ़ोतरी और रुपये पर दबाव

भारत अपनी आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और लगभग आधी प्राकृतिक गैस विदेशों से खरीदता है। यदि तेल के दामों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो देश का आयात बिल अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाएगा। इससे चालू खाता घाटा (CAD) चौड़ा होगा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के मूल्य पर भारी दबाव पड़ेगा।

महंगाई और परिवहन लागत में बढ़ोतरी की आशंका

उत्पादन न बढ़ाने के फैसले से बाजार में नकद तेल की उपलब्धता सीमित रहेगी, जिससे घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में राहत मिलने की संभावना समाप्त हो जाती है। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत में सीधा इजाफा होगा, जिसका सीधा असर खाद्य पदार्थों व दैनिक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। परिणामस्वरूप थोक व खुदरा महंगाई दर में पुनः उछाल आ सकता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बढ़ेगा।