बरतराई। देश और प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलता हुआ एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और चर्चा का विषय बना हुआ है। यह पूरा मामला बरतराई गांव की एक प्रसूता (गर्भवती महिला) से जुड़ा है, जिसे प्रसव पीड़ा के समय अस्पताल ले जाने के लिए समय पर एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधा तक नसीब नहीं हुई।
समय पर नहीं पहुंची एंबुलेंस
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह घटना शनिवार की है। बरतराई गांव से जिला अस्पताल की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है। परिजनों ने बताया कि प्रसूता की नाजुक स्थिति को देखते हुए उन्होंने तुरंत एंबुलेंस के लिए कॉल किया था, लेकिन करीब एक घंटे तक इंतजार करने के बावजूद एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची। परिजनों को यह जवाब दिया गया कि मानपुर से एंबुलेंस के रवाना होने के बाद ही उसे गांव भेजा जाएगा। प्रसव जैसी अत्यंत संवेदनशील और आपातकालीन स्थिति में जब समय बीतता गया और कोई मदद नहीं मिली, तो परिवार के पास पिकअप वाहन का सहारा लेने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।
अस्पताल पहुंचने पर भी बदइंतजामी
परिजनों ने किसी तरह पिकअप वाहन से प्रसूता को 15 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल पहुंचाया, लेकिन वहां पहुंचने पर भी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की बदहाली कम नहीं हुई। वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि अस्पताल के मुख्य गेट पर कोई भी कर्मचारी मौजूद नहीं था। ऐसी स्थिति में परिजनों को खुद ही वाहन से प्रसूता को नीचे उतारना पड़ा और स्ट्रेचर की मदद से उसे अस्पताल के अंदर ले जाना पड़ा।
स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के दावों पर सवाल
यह घटना एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के दावों की पोल खोलती है। सरकारें भले ही नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और समय पर एंबुलेंस उपलब्ध कराने के बड़े-बड़े दावे करती हों, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट नजर आती है। खासकर प्रसूता और नवजात शिशुओं के मामलों में एंबुलेंस जैसी जीवनरक्षक सुविधा का समय पर न पहुंचना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। बड़ा सवाल यह है कि जिस सरकारी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य ही आपातकाल में मरीजों को सहारा देना है, वहां एक प्रसूता के परिजनों को खुद ही सारी व्यवस्थाओं का बोझ क्यों उठाना पड़ रहा है?









