कोलकाता। चुनाव आयोग द्वारा ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज किए जाने के बाद राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है। आयोग के इस कदम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने कड़ा तंज कसा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को निजी संपत्तियों की तरह नहीं चलाया जा सकता और न ही वहां परिवारवाद के लिए कोई स्थान है।
राजनीतिक दल कोई प्राइवेट कंपनी नहीं: ऋतब्रत बनर्जी
ऋतब्रत बनर्जी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि पार्टी नेताओं के लिए यह फैसला काफी चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा, 'प्लेन से उतरते ही हमें पता चला कि सिंबल और नाम को फ्रीज कर दिया गया है। लोकतंत्र में तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं है।'
उन्होंने आगे कहा कि चुनाव आयोग के इस अंतरिम आदेश ने यह साबित कर दिया है कि वंशवादी राजनीति अब नहीं चलेगी। राजनीतिक पार्टियां कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां नहीं होती हैं और न ही इनका कोई तयशुदा वारिस हो सकता है।
क्या है चुनाव आयोग का पूरा मामला?
यह पूरा विवाद तब सामने आया जब चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतरिम रोक लगाने का बड़ा कदम उठाया। आयोग ने दोनों विरोधी गुटों को विवाद का समाधान होने तक नए नाम और चुनाव चिह्न चुनने का निर्देश दिया है।
आयोग के अनुसार, पार्टी के भीतर दो गुट सक्रिय हैं, जिनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे गुट की कमान अरूप रॉय के हाथ में है। दोनों ही धड़े पार्टी पर अपना असली अधिकार जता रहे हैं। इसी आंतरिक कलह और चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15 के तहत आयोग ने यह सख्त कदम उठाया है।
इस फैसले का सीधा असर आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों पर पड़ेगा, जहां नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं।









