पति-पत्नी विवाद में ‘मोटा’ शब्द बना वजह, तलाक की याचिका पर हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) ने पति-पत्नी के मध्य विवाद एवं तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले पर दूरगामी फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने पति की अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल पत्नी द्वारा पति को 'मोटा' या 'सांवला' कहना तलाक का वैधानिक आधार नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे व्यक्तिगत कटाक्ष अपने आप में कानून की दृष्टि में मानसिक क्रूरता या परित्याग (Abandonment) सिद्ध करने हेतु पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं।

क्या है पूरा विवाद?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़ित आकाश एवं पूजा (परिवर्तित नाम) का विवाह 7 मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था। पति का आरोप था कि विवाह के उपरांत पत्नी लगभग तीन माह ही उसके साथ रही और तत्पश्चात दोनों के मध्य वैचारिक मतभेद एवं विवाद प्रारंभ हो गए। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उसके साथ अनुचित व्यवहार करती थी, उसके शारीरिक रूप-रंग को लेकर 'मोटा और सांवला' कहकर व्यंग्य कसती थी तथा निरंतर गृह त्यागने की धमकी देती थी।

पारिवारिक न्यायालय से उच्च न्यायालय तक की कानूनी लड़ाई

इन आरोपों के आधार पर पति ने कुटुंब न्यायालय (फैमिली कोर्ट) में विवाह विच्छेद (तलाक) हेतु याचिका प्रस्तुत की थी, जिसे कुटुंब न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिया था। इस निर्णय के विरुद्ध पति ने बिलासपुर उच्च न्यायालय में प्रथम अपील दायर की। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पाया कि पति ने गंभीर आरोप तो लगाए हैं, परंतु उन्हें प्रमाणित करने हेतु कोई ठोस एवं निष्पक्ष साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जा सके।

उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी एवं निर्णय

मामले की विस्तृत सुनवाई के उपरांत उच्च न्यायालय की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने कहा कि केवल आपसी कहासुनी या शारीरिक बनावट पर की गई टिप्पणियों को क्रूरता की श्रेणी में रखकर तलाक की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने रेखांकित किया कि तलाक जैसे गंभीर विषय हेतु मानसिक क्रूरता और परित्याग के आरोपों को विधि सम्मत ठोस प्रमाणों से सिद्ध करना अनिवार्य है।

उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कुटुंब न्यायालय, जांजगीर-चांपा के पूर्व निर्णय को न्यायसंगत मानते हुए उसे यथावत बनाए रखा और पति की अपील को पूर्णतः खारिज कर दिया।