नेपाल की बड़ी पहल, हिमालयी ग्लेशियल झीलों के खतरे को कम करने की तैयारी

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काठमांडू। हिमालयी क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण ग्लेशियल झीलों (जीएलओएफ) का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस गंभीर संकट से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरदर्शी परियोजना शुरू करने की योजना बनाई है। इसके तहत देश की चार सबसे संवेदनशील झीलों के जलस्तर को नियंत्रित कर कम किया जाएगा, ताकि अचानक बाढ़ आने के संभावित जोखिम को प्रभावी रूप से टाला जा सके। लगभग 415 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य संभावित आपदाओं को नियंत्रित करना है, जिसका असर केवल नेपाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के सीमावर्ती मैदानी इलाकों तक भी पहुंचता है।

किन चार झीलों का जलस्तर किया जाएगा नियंत्रित?

इस परियोजना के अंतर्गत जिन चार प्रमुख झीलों को चुना गया है, उनमें ठुलागी, लोअर बारुण, लुमडिंग त्शो और होंगू द्वितीय शामिल हैं। ये सभी झीलें मध्य और पूर्वी नेपाल के बेहद दुर्गम और ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं, जिनकी समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 13,280 से 18,000 फीट के बीच है। इतनी अधिक ऊंचाई पर कम तापमान, ऑक्सीजन की कमी, लगातार हिमस्खलन और अचानक बाढ़ आने जैसी विकट परिस्थितियां इस परियोजना को तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद नेपाल सरकार लाखों लोगों के जीवन और उनकी संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

परियोजना की तकनीकी रूपरेखा और कार्यप्रणाली

योजना के अनुसार, इन झीलों से अतिरिक्त पानी को धीरे-धीरे और सुरक्षित तरीके से बाहर निकालने के लिए नियंत्रित नहरों (कंट్రోलड चैनल्स) और आधुनिक गेट प्रणाली का निर्माण किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों के जलस्तर को करीब तीन मीटर (लगभग 10 फीट) तक कम करने से उनके प्राकृतिक बांधों पर पड़ने वाला भारी जल दबाव काफी हद तक घट जाएगा, जिससे उनके टूटने का जोखिम न्यूनतम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, इस परियोजना में झीलों के जलस्तर और दबाव की चौबीसों घंटे निरंतर निगरानी के लिए अत्याधुनिक सेंसर लगाने तथा एक प्रभावी शुरुआती चेतावनी प्रणाली (अर्ली वार्निंग सिस्टम) विकसित करने का भी प्रावधान किया गया है। इस पूरी परियोजना को पूरा होने में कई वर्ष लगने का अनुमान है, लेकिन इसके दीर्घकालिक सकारात्मक परिणाम बेहद व्यापक होंगे।

भारत के लिए क्यों बेहद अहम है यह परियोजना?

इस सुरक्षात्मक परियोजना का महत्व केवल नेपाल की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नेपाल की इन हिमालयी झीलों से निकलने वाला पानी आगे चलकर कोशी, गंडक और अन्य प्रमुख नदी प्रणालियों का हिस्सा बनता है, जो बहकर भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में प्रवेश करती हैं।

यदि इनमें से किसी भी झील का प्राकृतिक बांध टूटता है, तो अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़ का सीधा असर नेपाल से आगे बढ़कर भारत के इन सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंच सकता है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे में, इन झीलों के जलस्तर की समय रहते निगरानी होने और भारत-नेपाल स्तर पर शुरुआती चेतावनी मिलने से निचले इलाकों में प्रशासन को आपदा से निपटने, तैयारी करने और समय रहते बचाव कार्य करने के लिए मूल्यवान अतिरिक्त समय मिल सकेगा।