आधुनिक युद्ध की चुनौती से निपटने की तैयारी, टैंकों पर लगेगा ड्रोन रोधी कवच

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नई दिल्ली। आधुनिक युद्धकौशल में छोटे ड्रोन और सुसाइड ड्रोन टैंकों व अन्य भारी सैन्य वाहनों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। इसी बदलते युद्धक्षेत्र के खतरे को भांति हुए भारत ने अपने मौजूदा मुख्य युद्धक टैंकों को काउंटर-ड्रोन सिस्टम से लैस करने की दिशा में एक अहम शुरुआत कर दी है। रक्षा मंत्रालय ने ऑपरेशनल टैंकों पर काउंटर-यूएएस (ड्रोन रोधी प्रणाली) लगाने के लिए खरीद और रेट्रोफिटिंग की प्रक्रिया को हरी झंडी दिखा दी है।

प्रमुख टैंक बेड़े में शामिल होंगे ड्रोन रोधी सिस्टम

इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत भारतीय सेना के प्रमुख टैंक बेड़े में शामिल टी-90 भीष्म, टी-72 अजेय और स्वदेशी अर्जुन टैंकों को प्राथमिकता के आधार पर अपग्रेड किए जाने की संभावना है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के अनुसार, मौजूदा टैंकों में ड्रोन रोधी तकनीक को जोड़ने की इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य नए लड़ाकू वाहनों के बेड़े में शामिल होने का लंबा इंतजार किए बिना वर्तमान टैंकों को ड्रोन हमलों से अधिक सुरक्षित और सक्षम बनाना है। हालांकि, इस रक्षा प्रणाली की सटीक तकनीकी खूबियों और कुल कितने टैंकों को इस तकनीक से लैस किया जाएगा, इसका विस्तृत ब्योरा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

बदलते युद्धक्षेत्र में ड्रोन हमलों का बढ़ता खतरा

हाल के वर्षों में दुनिया भर के युद्धों में ड्रोनों का उपयोग केवल निगरानी या रेकी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे हमलों के लिए भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाने लगा है। कम ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले छोटे ड्रोन टैंकों की सटीक स्थिति का आसानी से पता लगा सकते हैं और उन पर विस्फोटक गिराकर या लोइटरिंग म्यूनिशन के जरिए भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। आकार में बेहद छोटे होने और कम लागत के कारण इनकी भारी संख्या का इस्तेमाल संभव होता है, जिससे पारंपरिक वायु रक्षा प्रणालियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।

काउंटर-यूएएस सिस्टम आमतौर पर ड्रोन का पता लगाने, उसकी पहचान करने, उसे ट्रैक करने और फिर उस खतरे को पूरी तरह निष्क्रिय करने की क्षमता पर काम करते हैं। इसके लिए छोटे रडार, आधुनिक कैमरे और अन्य संवेदनशील सेंसरों का उपयोग किया जाता है। खतरे को रोकने के लिए इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग जैसे 'सॉफ्ट-किल' उपायों के साथ-साथ ड्रोन को भौतिक रूप से नेस्तनाबूद करने वाले 'हार्ड-किल' विकल्पों को भी आजमाया जा सकता है। हालांकि, भारतीय टैंकों पर इनमें से किस तकनीक या उनके किस संयोजन को तैनात किया जाएगा, इस पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।

तकनीकी चुनौतियां और घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा

मौजूदा और पुराने टैंकों में इस प्रकार की जटिल प्रणाली को जोड़ना अपने आप में एक बड़ी तकनीकी चुनौती है। रेट्रोफिटिंग की इस प्रक्रिया के दौरान सिस्टम के वजन, उसके आकार, अतिरिक्त बिजली की खपत और टैंक की गतिशीलता (मोबिलिटी) जैसे तमाम पहलुओं का विशेष ध्यान रखना होगा, ताकि टैंक की मुख्य तोप और अन्य सामरिक युद्ध प्रणालियों के संचालन पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

इस दूरदर्शी कदम से भारतीय रक्षा उद्योग को भी एक नई गति और बढ़ावा मिलने की पूरी उम्मीद है। रडार, आधुनिक सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर तकनीक विकसित करने वाली स्वदेशी घरेलू कंपनियों के लिए इससे नए और बड़े अवसर पैदा होंगे। यह पहल बदलते युद्धक्षेत्र की जरूरतों के अनुरूप भारत की बख्तरबंद ताकत को और अधिक आधुनिक बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।