आजकल बदलती जीवनशैली, गलत खानपान और शारीरिक गतिविधियों की भारी कमी के कारण डायबिटीज (मधुमेह) का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। एक बार डायबिटीज की समस्या शुरू हो जाने के बाद इसे पूरी तरह ठीक कर पाना बेहद मुश्किल होता है, और इसे मुख्य रूप से दवाओं, खानपान और लाइफस्टाइल के जरिए ही नियंत्रित रखा जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कम उम्र में ही इस समस्या पर ध्यान दिया जाए और समय रहते सही जाँच करा ली जाए, तो इसके जोखिमों को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है।
विशेष तौर पर 'प्री-डायबिटीज' की स्थिति में यदि व्यक्ति सतर्क हो जाए, तो इस गंभीर बीमारी को पूरी तरह शुरू होने से पहले ही रोका जा सकता है। इस अवस्था में शरीर में ब्लड शुगर (खून में ग्लूकोज) का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है, लेकिन यह पूर्ण डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुँचता है। इसे भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज होने का एक स्पष्ट चेतावनी संकेत माना जाता है। डॉक्टर मानते हैं कि टेस्ट रिपोर्ट में प्री-डायबिटीज आने का मतलब केवल खतरे की घंटी नहीं है, बल्कि यह शरीर का ऐसा संकेत है जो हमें समय रहते संभलने और अपनी जीवनशैली में सुधार करने का अवसर देता है।
प्री-डायबिटीज के शुरुआती लक्षण और पहचान के तरीके
प्री-डायबिटीज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती दौर में ज्यादातर लोगों में इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति पूरी तरह सामान्य महसूस करता है, लेकिन उसके शरीर के भीतर ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा हुआ होता है।
त्वचा में बदलाव: कुछ मामलों में गर्दन, बगल या शरीर के अन्य हिस्सों की त्वचा का रंग गहरा होने लगता है और त्वचा मोटी पड़ने लगती है। यह 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' का एक प्रमुख संकेत हो सकता है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करतीं।
वजन बढ़ना और अन्य संकेत: शरीर का वजन बढ़ना, पेट के आसपास अत्यधिक चर्बी का जमा होना, बार-बार प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना और लगातार थकान महसूस होना भी बढ़े हुए ब्लड शुगर के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर से तुरंत सलाह लेनी चाहिए।
पहचान के लिए मुख्य जाँच (ब्लड टेस्ट): प्री-डायबिटीज का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है, जिसमें मुख्य रूप से तीन प्रकार की जाँचें की जाती हैं:
HbA1c टेस्ट: इसका स्तर 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच होने पर प्रीडायबिटीज मानी जाती है। यह पिछले दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर का आकलन करता है।
फास्टिंग ब्लड शुगर: खाली पेट ब्लड शुगर का स्तर 100 से 125 mg/dL होने पर यह प्रीडायबिटीज की श्रेणी में आता है।
ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (GTT): ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद ब्लड शुगर 140 से 199 mg/dL होने पर प्रीडायबिटीज की पुष्टि होती है।
विशेषज्ञों की राय: क्या प्री-डायबिटीज को रिवर्स किया जा सकता है?
हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से प्रशिक्षित प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी के अनुसार, प्री-डायबिटीज को वापस सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है, खासकर यदि समय रहते उचित कदम उठाए जाएं। सही जीवनशैली अपनाकर प्री-डायबिटीज को रिवर्स करने में 70 से 80 प्रतिशत तक मदद मिल सकती है। यदि इस दौरान जीवनशैली में कोई सुधार न किया जाए, तो पैंक्रियाज की वे कोशिकाएं जो इंसुलिन का निर्माण करती हैं, हर साल अपनी कार्यक्षमता का लगभग 4-5 प्रतिशत हिस्सा खोती जाती हैं।
डॉ. सेठी एक आम गलतफहमी को दूर करते हुए बताते हैं कि बीटा सेल्स हमेशा के लिए पूरी तरह नष्ट नहीं होतीं, बल्कि कई बार वे लगातार अत्यधिक काम करने की वजह से केवल थकी हुई होती हैं। सही खानपान और स्वस्थ जीवनशैली की आदतों से इन कोशिकाओं की कार्यक्षमता में दोबारा सुधार लाया जा सकता है। अध्ययनों से यह भी साबित हुआ है कि प्री-डायबिटीज के दौरान जिन लोगों ने अपने शरीर का 10 से 15 प्रतिशत वजन कम किया, उनमें से 86 प्रतिशत तक लोगों में टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने का खतरा टल गया। वजन घटने से लिवर और पैंक्रियाज के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी कम होती है, जिससे शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता में जबरदस्त सुधार होता है।
प्री-डायबिटीज को सामान्य करने और डायबिटीज से बचने के प्रमुख उपाय
अपनी दैनिक जीवनशैली और आदतों में कुछ जरूरी बदलाव करके ब्लड शुगर के स्तर को फिर से सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है:
खानपान में सुधार: अपने दैनिक आहार में हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, साबुत अनाज, ताजे फल और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थों को प्रमुखता से शामिल करें। पैकेटबंद चीजें, मीठे पेय पदार्थ, मिठाइयां और अत्यधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थों के सेवन से पूरी तरह परहेज करें।
नियमित व्यायाम और शारीरिक सक्रियता: सप्ताह में कम से कम 150 मिनट तेज चाल से टहलना (ब्रिस्क वॉक) या अन्य मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधियों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। शुरुआत हमेशा धीमी गति से करें और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार धीरे-धीरे समय व तीव्रता बढ़ाएं।
वजन को नियंत्रित रखें: यदि आपका वजन सामान्य से अधिक है, तो संतुलित आहार और शारीरिक मेहनत के जरिए धीरे-धीरे वजन कम करें। वजन नियंत्रण में रहने से शरीर में इंसुलिन के काम करने की क्षमता में सुधार होता है।
पर्याप्त नींद और मानसिक तनाव प्रबंधन: हर रात कम से कम 7 से 8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लें। मानसिक तनाव को कम करने के लिए योग, ध्यान (मेडिटेशन) या अपनी पसंद की आरामदायक गतिविधियों को अपनाएं।








