भोपाल। राजधानी भोपाल के मिसरोद थाने में पदस्थ थाना प्रभारी रतन सिंह को आदिवासी समाज के खिलाफ कथित तौर पर अभद्र टिप्पणी करना भारी पड़ गया है। इस गंभीर मामले में शिकायत मिलने और शुरुआती विभागीय जांच सही पाए जाने के बाद पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
आदिवासी छात्रों के प्रदर्शन के दौरान दिया गया था विवादित बयान
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ दिनों पहले राजधानी में आदिवासी छात्रों और युवाओं का एक प्रदर्शन चल रहा था। इसी दौरान मिसरोद थाना प्रभारी रतन सिंह पर यह आरोप लगा कि उन्होंने प्रदर्शन के दौरान आदिवासी समाज के संबंध में आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था। जब यह मामला तूल पकड़ने लगा और उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंची, तो पुलिस कमिश्नर ने इसे बेहद गंभीरता से लिया। इसके बाद डीसीपी जोन-2 विकास सहवाल को पूरे मामले की विभागीय जांच सौंपकर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए थे। जांच में आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाने के बाद कमिश्नर ने यह कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की है। पुलिस विभाग का यह स्पष्ट संदेश है कि कानून के रखवालों से समाज के हर वर्ग के प्रति सम्मानजनक आचरण की उम्मीद की जाती है और किसी भी समुदाय के प्रति असंवेदनशीलता या अभद्रता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
थानों में बढ़ रहा है काम का दबाव और स्टाफ की किल्लत
एक तरफ जहां पुलिस कमिश्नर स्तर पर अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त तेवर दिखाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजधानी के थानों में विवेचना अधिकारियों (आईओ) और स्टाफ की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, शहर के कई थानों में स्थिति यह है कि एक-एक सब-इंस्पेक्टर के पास दर्जनों आपराधिक मामलों की जांच का जिम्मा है। अमले की भारी कमी के कारण मामलों की फाइलें समय पर आगे नहीं बढ़ पा रही हैं और चालान पेश करने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के कार्यभार और मानसिक दबाव का सीधा असर मामलों के त्वरित निराकरण और पीड़ितों को समय पर न्याय मिलने की प्रक्रिया पर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में पुलिस प्रशासन इस व्यवस्था को सुधारने के लिए मैदानी अमले में फेरबदल और नई पदस्थापनाओं पर विचार कर रहा है।








