दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते अस्पताल बाजार की तलाश में वॉल स्ट्रीट के दिग्गज निवेशक भारत पहुँचे हैं, लेकिन अरबों डॉलर के भारी-भरकम निवेश के साथ ही अब भारतीय स्वास्थ्य सेवा के सबसे बड़े और गंभीर सवाल पर आर-पार की जंग छिड़ गई है कि आखिरकार इतना महंगा मेडिकल बिल भरेगा कौन?
विदेशी निवेश और निजी फंड्स की बढ़ती दखलअंदाजी
कंसल्टेंसी फर्म ईवाई के आंकड़ों के अनुसार, बीते पाँच वर्षों में ब्लैकस्टोन, केकेआर, टीपीजी, टेमासेक और जनरल अटलांटिक जैसे वैश्विक निजी निवेश फंड्स (पीई फंड्स) ने भारतीय अस्पतालों में हिस्सेदारी खरीदने के लिए लगभग 10 अरब डॉलर यानी 95,000 करोड़ रुपये का भारी निवेश किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस विदेशी पूंजी ने देश में अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण, नए बेड और बड़े अस्पतालों के विलय (मर्जर) को बढ़ावा जरूर दिया है, लेकिन इसने भारत के मध्यम वर्ग के लिए इलाज को काफी हद तक पहुँच से बाहर भी कर दिया है। दूसरी ओर, बीमा कंपनियों का यह गंभीर आरोप है कि वॉल स्ट्रीट फंड्स से संचालित होने वाले ये अस्पताल अपने मुनाफे को चमकाने के लिए मेडिकल बिलों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं और मरीजों पर गैर-जरूरी व बेहद खर्चीली रोबोटिक सर्जरी थोप रहे हैं।
मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है सबसे भारी आर्थिक बोझ
विशेषज्ञों का यह साफ मानना है कि इस पूरे खेल में सबसे बुरी तरह भारत का वह मध्यम वर्ग कुचल रहा है जो न तो इतना गरीब है कि उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके, और न ही इतना अमीर है कि वह हर साल तेजी से बढ़ रहे मेडिकल बिलों तथा महंगे हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम का भारी-भरकम बोझ आसानी से उठा सके।
रोबोटिक सर्जरी का फरेब और मरीजों की जेब पर पड़ रहा डाका
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पीई फंड्स की इस व्यावसायिक पूंजी का भारी आर्थिक खामियाजा आम जनता को इलाज की बेतहाशा बढ़ती लागत के रूप में चुकाना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों की तुलना में आधुनिक निजी अस्पतालों में इलाज 5 से 10 गुना तक महंगा हो चुका है। बीमा क्षेत्र के जानकारों का यह भी आरोप है कि कई अस्पताल मरीजों को रोबोटिक सर्जरी की तरफ धकेलते हैं, जो पारंपरिक सर्जरी की तुलना में कई गुना महंगी होती है, जबकि दोनों के चिकित्सीय (क्लीनिकल) नतीजों में कोई खास बड़ा अंतर नहीं होता है।
अस्पतालों के बेड से ज्यादा अब बोर्डरूम में चल रहा है कारोबार का खेल
केरल के 'कानाटे हॉस्पिटल्स' के प्रबंध निदेशक और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की स्टेट यूनिट के पूर्व अध्यक्ष जोसेफ बेनावेन भारतीय स्वास्थ्य सेवा के इस बदलते हुए व्यावसायिक मिजाज का कड़वा सच बयां करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वास्थ्य सेवा में सबसे बड़ा बदलाव अब ऑपरेशन थिएटर के भीतर नहीं, बल्कि अस्पतालों के कॉर्पोरेट बोर्डरूम में देखने को मिल रहा है। आज के समय में डॉक्टरों और अस्पतालों का मूल्यांकन इस आधार पर किया जा रहा है कि वे प्रति बेड कितना राजस्व (रेवेन्यू) कमाकर निवेशकों को कितना मुनाफा दे रहे हैं।
भारत में प्रति 1,000 नागरिकों पर केवल 1.3 अस्पताल बेड ही उपलब्ध हैं, जो विकसित देशों के वैश्विक औसत से बेहद कम है। विदेशी निजी निवेश फंड्स ने इसी बुनियादी कमी का पूरा फायदा उठाया और कार्डियक सर्जरी, ऑन्कोलॉजी (कैंसर) तथा ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसे उच्च मुनाफे (हाई-मार्जिन) वाले स्पेशियल्टी क्षेत्रों पर अपना पूरा शिकंजा कस लिया है।









