अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत का खजाना रिकॉर्ड हाई, इस फैसले से आए अरबों डॉलर

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वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (फॉरेक्स रिजर्व) ने एक नया ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है। लगातार नौ हफ्तों की बढ़त के साथ देश का विदेशी मुद्रा भंडार 740 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। फरवरी 2026 में अमेरिका-ईरान संकट के समय जब डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बना था, तब यह भंडार 728.5 अरब डॉलर के आसपास था। केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप और रणनीतिक कदमों के चलते अब देश की वित्तीय स्थिति बेहद मजबूत स्तर पर आ गई है।

आरबीआई की विशेष स्वैप विंडो ने बदला परिदृश्य

विदेशी मुद्रा के इस भारी प्रवाह में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की विशेष एफसीएनआर (बी) [फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक)] विंडो का सबसे बड़ा योगदान रहा। जून में शुरू की गई इस सुविधा का उद्देश्य प्रवासी भारतीयों (एनआरआई) को भारत के बैंकों में विदेशी मुद्रा जमा कराने के लिए आकर्षित करना था।

इस व्यवस्था में मूलधन और ब्याज दोनों विदेशी मुद्रा में ही सुरक्षित रहते हैं, जिससे जमाकर्ताओं को रुपये के अवमूल्यन का जोखिम नहीं उठाना पड़ता। इसके अलावा, आरबीआई ने बैंकों की मुद्रा हेजिंग लागत को कम करने में सहायता की, जिससे बैंक ग्राहकों को अधिक आकर्षक रिटर्न देने में सक्षम हुए।

अनुमान से कहीं अधिक 136 अरब डॉलर की आवक

केंद्रीय बैंक ने शुरुआत में इस योजना के जरिए लगभग 80 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा था, किंतु 31 अगस्त को समाप्त हुई इस विशेष डॉलर स्वैप स्कीम के तहत कुल 136.38 अरब डॉलर की विदेशी पूंजी देश में आई। योजना के अंतिम 10 दिनों में ही लगभग 50 फीसदी राशि जुटाई गई।

कुल राशि में एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट का हिस्सा 127.23 अरब डॉलर रहा, जबकि विदेशी मुद्रा बॉन्ड से 5.3 अरब डॉलर और बाहरी वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) के माध्यम से 3.9 अरब डॉलर प्राप्त हुए। भारी सफलता के चलते इस विंडो को निर्धारित समय से पहले ही बंद कर दिया गया।

2013 की रणनीति दोहराई गई, रुपये को मिला संबल

आरबीआई ने यह कदम 2013 के ‘टेपर टैंट्रम’ के दौरान अपनाई गई रणनीति की तर्ज पर उठाया, जब 26 अरब डॉलर जुटाकर रुपये को स्थिर किया गया था। इस भारी इनफ्लो के चलते डॉलर के मुकाबले रुपया दो महीने के उच्चतम स्तर 94.48 पर पहुंच गया। जानकारों के अनुसार, यदि यह विशेष विंडो समय पर शुरू नहीं की गई होती, तो घरेलू मुद्रा में बड़ी गिरावट आ सकती थी।

10 माह से अधिक के आयात का सुरक्षा कवच

वर्तमान विदेशी मुद्रा भंडार देश के 10 महीने से अधिक के आयात खर्च को कवर करने के लिए पर्याप्त है, जिससे भारत बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए बेहद मजबूत स्थिति में आ गया है। वैश्विक स्तर पर रिफाइनिंग क्षमता पर दबाव के बीच भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात मार्जिन में भी तेजी आई है, जिससे महंगे कच्चे तेल के असर को संतुलित करने में मदद मिली है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों के विश्वास में वृद्धि और एफडीआई में सुधार के संकेत भी मिल रहे हैं।

हेजिंग लागत और आगे का गणित

हालांकि इस सफलता के साथ एक वित्तीय लागत भी जुड़ी है। आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है कि हेजिंग की प्रक्रिया में आरबीआई को करीब 3 प्रतिशत की लागत का वहन करना पड़ सकता है, जो लगभग 12 लाख करोड़ रुपये की राशि पर 36,000 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। इसके बावजूद नीति निर्माताओं का मानना है कि इन जुटाए गए डॉलर्स को अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश करने से प्राप्त होने वाला ब्याज इस लागत की काफी हद तक भरपाई कर देगा।